आज की युवा पीढ़ी में सुबह उठते ही और रात को सोने से पहले सोशल मीडिया रील्स स्क्रॉल करने की आदत तेजी से बढ़ रही है। इसका असर सिरदर्द, चिड़चिड़ेपन और पढ़ाई में मन न लगने जैसी समस्याओं के रूप में सामने आ रहा है। लेकिन इस नवरात्रि कुछ युवा अन्न त्यागने के साथ-साथ ‘डिजिटल व्रत’ का संकल्प भी ले रहे हैं। इसके तहत दैनिक स्क्रीन टाइम सिर्फ 1 घंटा तय करना और सोने से 2 घंटे पहले फोन को खुद से दूर रखना जैसे बदलाव अपनाए जा रहे हैं। शुरुआती दिनों में बार-बार फोन देखने की इच्छा (FOMO) परेशान कर सकती है, लेकिन धीरे-धीरे डिजिटल डिटॉक्स मानसिक शांति, आत्म-नियंत्रण और बेहतर दिनचर्या की दिशा में एक प्रभावी कदम बन रहा है।
मनोचिकित्सक डॉ. समीर मल्होत्रा के अनुसार, शॉर्ट-फॉर्म रील्स देखने से दिमाग के रिवॉर्ड सिस्टम को लगातार डोपामाइन के छोटे-छोटे स्पाइक्स मिलते हैं, जिससे ‘डोपामाइन रिवॉर्ड पाथवे’ एक्टिव रहता है। यह आदत व्यक्ति के अटेंशन स्पैन, याददाश्त और धैर्य को बुरी तरह प्रभावित करती है। स्क्रीन से दूरी बनाने से दिमाग को इस ओवरस्टिम्युलेशन से उबरने का मौका मिलता है।
नवंबर 2025 में प्रसिद्ध मेडिकल जर्नल JAMA Network Open में प्रकाशित हार्वर्ड मेडिकल स्कूल और बेथ इजराइल डीकोनेस मेडिकल सेंटर की एक स्टडी के मुताबिक, 18 से 24 साल के युवाओं द्वारा सिर्फ एक हफ्ते तक सोशल मीडिया से दूरी बनाने पर स्वास्थ्य में अद्भुत सुधार देखे गए:
रात को सोने से ठीक पहले फोन देखने पर स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी (Blue Light) शरीर में नींद लाने वाले मुख्य हार्मोन ‘मेलाटोनिन’ के निर्माण को रोक देती है। इससे दिमाग को ‘दिन’ होने का भ्रम हो जाता है और गहरी नींद (REM cycle) बाधित होती है।
सोने से 30 से 60 मिनट पहले फोन दूर रखने से मेलाटोनिन का प्राकृतिक स्त्राव शुरू होता है, जिससे शरीर की बायोलॉजिकल क्लॉक सही रहती है और सुबह ताजगी महसूस होती है। शुरुआत में 24 से 72 घंटों तक बेचैनी या FOMO (Fear of Missing Out) होना स्वाभाविक है, जिसे योग, प्राणायाम, परिवार के साथ समय बिताकर या नेचर वॉक के जरिए संभाला जा सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में सुधार लाने के लिए ये 3 छोटे बदलाव किए जा सकते हैं:
नो-रील मॉर्निंग: सुबह उठने के बाद पहले 1 घंटे तक फोन बिल्कुल न देखें।
एक घंटे की सीमा: फोन में ऐप टाइमर लगाकर सोशल मीडिया के इस्तेमाल की समय-सीमा तय करें।
बेडरूम नो-फोन जोन: सोने से 30-60 मिनट पहले फोन दूर रख दें। इसके अलावा डाइनिंग टेबल और बाथरूम में भी फोन साथ न ले जाएं।
डिजिटल उपवास के बाद भी गैर-जरूरी नोटिफिकेशन्स बंद रखें और डिजिटल वेलबीइंग फीचर्स का इस्तेमाल करें। अगर बार-बार कोशिश करने के बावजूद स्क्रीन टाइम कंट्रोल न हो और दैनिक जीवन प्रभावित हो रहा हो, तो मनोचिकित्सक से सलाह लेना बेहद जरूरी है। ध्यान रहे, डिजिटल उपवास का मकसद फोन पूरी तरह छोड़ना नहीं, बल्कि इसका इस्तेमाल सोच-समझकर और संतुलित तरीके से करना है।
डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी केवल जागरूकता और शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय या मानसिक स्वास्थ्य सलाह का विकल्प नहीं है। यदि आप या आपका कोई परिचित अत्यधिक स्क्रीन टाइम, डिप्रेशन, एंग्जायटी या नींद की गंभीर समस्या से जूझ रहा है, तो कृपया किसी योग्य मनोचिकित्सक या स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श लें।
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