डिजिटल मीडिया के इस दौर में जहां सोशल मीडिया पर बच्चों की सुरक्षा और ऑनलाइन यौन शोषण को लेकर चिंताएं चरम पर हैं, वहीं देश की सर्वोच्च अदालत ने एक ऐसा मील का पत्थर फैसला सुनाया है जिसने पूरे देश का ध्यान खींच लिया है। क्या बच्चों को इंटरनेट के खतरों से बचाने के लिए उनके ऑनलाइन एक्सेस पर पूरी तरह रोक लगाई जा सकती है? जस्टिस जे बी पारडीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने इस संवेदनशील मुद्दे पर सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि सुरक्षा के नाम पर बच्चों की आजादी और उनके मूल अधिकारों को छीना नहीं जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 और 19(1)(a) के तहत इंटरनेट का इस्तेमाल हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, और यह अधिकार बच्चों को भी उतना ही हासिल है। जजों ने माना कि बच्चों की सुरक्षा और उनकी आजादी एक-दूसरे के खिलाफ नहीं हैं बल्कि बच्चों को इन दोनों का अधिकार है।
कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर बच्चों पर इंटरनेट का पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया, तो इसके बेहद बुरे परिणाम हो सकते हैं। बच्चे छुपकर अनियंत्रित प्लेटफॉर्म्स का रुख कर सकते हैं, जहां उनके लिए खतरा और बढ़ जाएगा, और डर के कारण वे माता-पिता से ऑनलाइन उत्पीड़न या धमकी की बात साझा करने से भी कतराएंगे।
कोर्ट ने अपने फैसले में 2020 के चर्चित ‘अनुराधा भसीन‘ और 2025 के ‘प्रज्ञा प्रसून‘ फैसलों का जिक्र किया, जिनमें इंटरनेट के माध्यम से अभिव्यक्ति की आजादी और डिजिटल पहुंच को मान्यता दी गई थी। कोर्ट के अनुसार, दूरदराज के इलाकों या विशेष जरूरतों वाले बच्चों के लिए इंटरनेट सीखने और जुड़ने का एकमात्र साधन हो सकता है। सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बेंच ने कई अहम सुझाव दिए:
बेंच ने साफ किया कि ये उसके सुझाव हैं और इन्हें लागू करने का तरीका केंद्र सरकार तय कर सकती है। सरकार बच्चों को वयस्क या हानिकारक सामग्री से दूर रखने के लिए उचित प्रतिबंध लगा सकती है।
साथ ही, सोशल मीडिया और ऑनलाइन सेवाओं पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री की पहचान करने और उसे तुरंत हटाने की व्यवस्था को मजबूत करने का निर्देश दिया गया है। इसके लिए एक राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने की बात कही गई है, ताकि गलत और आपत्तिजनक सामग्री को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से तुरंत पहचान कर हटाया जा सके।
जहाँ एक तरफ फ्रांस,ऑस्ट्रेलिया,तुर्की,ब्राजील,डेनमार्क और ऑस्ट्रिया जैसे देशों में बच्चों और किशोरों को ऑनलाइन खतरों से बचाने के लिए सोशल मीडिया या इंटरनेट के इस्तेमाल पर सख्त पाबंदियाँ व उम्र से जुड़े कड़े नियम लागू किए गए हैं, वहीं भारतीय सुप्रीम कोर्ट का यह रुख बिल्कुल अलग और प्रगतिशील सोच को दर्शाता है। शीर्ष अदालत ने साफ़ कर दिया है कि समाधान पूर्ण प्रतिबंध लगाने में नहीं, बल्कि सुरक्षित डिजिटल माहौल तैयार करने में है। अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है—देखना यह होगा कि सरकार बच्चों के मौलिक अधिकारों और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाते हुए किस तरह के नियम और दिशानिर्देश तैयार करती है।
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