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डॉलर की बादशाहत को सीधी चुनौती ? जिनपिंग बोले– युआन को बनाओ दुनिया की ‘रिज़र्व करेंसी’

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि बीजिंग अब सिर्फ दुनिया की फैक्ट्री बनकर नहीं रहना चाहता, बल्कि वैश्विक आर्थिक सिस्टम के नियम भी बदलना चाहता है। इसी कड़ी में उन्होंने चीनी मुद्रा युआन (रेनमिनबी) को “मजबूत मुद्रा” बनाने की बात कही है, ताकि दूसरे देश इसे अंतरराष्ट्रीय रिजर्व के तौर पर जमा करें — ठीक वैसे ही जैसे आज अमेरिकी डॉलर किया जाता है।

शी का यह बयान चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की थ्योरी मैगजीन किउशी में छपे एक लेख के अंशों में सामने आया है, जो 2024 में प्रांतीय और केंद्रीय अधिकारियों को दिए गए उनके भाषण पर आधारित है। भले ही उन्होंने सीधे अमेरिकी डॉलर का नाम नहीं लिया, लेकिन मैसेज बिल्कुल साफ है — डॉलर की दशकों पुरानी बादशाहत को चुनौती।

शी जिनपिंग का कहना है कि चीन को ऐसी मुद्रा चाहिए जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार, निवेश और फॉरेक्स मार्केट में खुले तौर पर इस्तेमाल हो। उनके मुताबिक, युआन अगर वैश्विक रिजर्व मुद्रा बनता है तो वह चीन की आर्थिक, वैज्ञानिक, तकनीकी और राष्ट्रीय ताकत की मजबूत नींव बनेगा। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि यह कोई शॉर्टकट नहीं, बल्कि लंबी दूरी की रणनीति है, जो मजबूत इकोनॉमिक बेस पर ही सफल होगी।

डॉलर की पकड़ क्यों ढीली पड़ रही है?

आज भी अमेरिकी डॉलर दुनिया की सबसे ताकतवर रिजर्व मुद्रा है और करीब 58 फीसदी वैश्विक व्यापार उसी में होता है। लेकिन चीन पिछले कई सालों से युआन के अंतरराष्ट्रीयकरण पर लगातार काम कर रहा है। 2025 में चीन के कुल 6.2 ट्रिलियन डॉलर के विदेशी व्यापार का लगभग 30 फीसदी हिस्सा युआन में सेटल हुआ। ब्रिक्स देशों, बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट्स और तेल व्यापार में भी युआन की हिस्सेदारी बढ़ रही है। रूस और ईरान जैसे देशों में, जहां डॉलर पर पाबंदियां हैं, वहां युआन एक मजबूत विकल्प बनकर उभरा है। इसके साथ ही डिजिटल युआन (e-CNY) को भी चीन वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ा रहा है।

डी-डॉलराइजेशन की ओर एक और कदम

विश्लेषक इस बयान को अमेरिका की आक्रामक टैरिफ पॉलिसी, प्रतिबंधों और डॉलर की ‘हेजेमनी’ से जोड़कर देख रहे हैं, खासकर ट्रंप दौर की नीतियों के बाद। इन वजहों से कई देशों का डॉलर पर भरोसा हिला है और ‘डी-डॉलराइजेशन’ की चर्चा तेज हुई है। हालांकि सच्चाई यह भी है कि अभी वैश्विक रिजर्व में युआन की हिस्सेदारी सिर्फ करीब 2 फीसदी है।

रास्ता आसान नहीं, लेकिन मौके बड़े

एक्सपर्ट्स मानते हैं कि युआन को पूरी तरह रिजर्व मुद्रा बनाना आसान नहीं होगा। चीन की सख्त सरकारी कंट्रोल पॉलिसी और कैपिटल अकाउंट की सीमित कन्वर्टिबिलिटी बड़ी चुनौती हैं। लेकिन अमेरिका की अनिश्चित आर्थिक और राजनीतिक नीतियां डॉलर के लिए जोखिम पैदा कर रही हैं, जिससे युआन को आगे बढ़ने का मौका मिल सकता है।

कुल मिलाकर, यह पूरी तस्वीर दुनिया को एक बहुध्रुवीय वित्तीय सिस्टम की ओर जाते दिखा रही है, जहां सिर्फ डॉलर नहीं, बल्कि युआन, यूरो और दूसरी मुद्राएं भी बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। चीन का दावा है कि युआन का यह सफर किसी दबाव से नहीं, बल्कि बाजार की जरूरत और आपसी सहयोग से आगे बढ़ रहा है।

news desk

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