Trending News

ट्रंप से क्यों नाराज हैं सऊदी-UAE समेत खाड़ी देश? अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर उठने लगे सवाल

ईरान के साथ लंबे समय से जारी युद्ध को खत्म करने की अमेरिकी रणनीति पर अब उसके सबसे करीबी खाड़ी सहयोगियों में असंतोष बढ़ता दिख रहा है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर, कुवैत और बहरीन जैसे देशों को चिंता है कि अमेरिका की अनिश्चित नीति ने उन्हें ऐसे संघर्ष के बीच खड़ा कर दिया है, जिसका सीधा असर उनकी सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।

स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि कुछ खाड़ी देशों में अपनी जमीन पर अमेरिकी सैन्य ठिकानों की मौजूदगी के फायदे और नुकसान पर चर्चा शुरू हो गई है। हालांकि, अभी तक किसी देश ने अमेरिकी सैन्य अड्डों को हटाने का फैसला नहीं किया है।

ट्रंप की ईरान नीति से क्यों बढ़ी नाराजगी?

खाड़ी देशों की नाराजगी की बड़ी वजह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान नीति को माना जा रहा है। क्षेत्रीय अधिकारियों और विशेषज्ञों के मुताबिक, ट्रंप ने कभी ईरान पर सैन्य दबाव बढ़ाने की बात की तो कभी बातचीत में प्रगति का संकेत दिया। इस बदलते रुख ने अमेरिकी सहयोगियों के बीच रणनीतिक अनिश्चितता बढ़ा दी है।

खाड़ी देशों को सबसे ज्यादा चिंता इस बात की है कि संघर्ष का असर अब उनके अपने इलाके, ऊर्जा प्रतिष्ठानों और व्यापारिक गतिविधियों पर पड़ रहा है।

एक खाड़ी अधिकारी के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच शुरू हुए संघर्ष का खामियाजा अब पूरे क्षेत्र को भुगतना पड़ रहा है।

अमेरिका के सैन्य ठिकानों पर पहली बार गंभीर बहस

कतर और बहरीन समेत कई खाड़ी देशों में अमेरिका के महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाने हैं। ये बेस दशकों से क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था का अहम हिस्सा रहे हैं।

लेकिन मौजूदा संकट ने खाड़ी देशों को यह सोचने पर मजबूर किया है कि अमेरिकी सैन्य मौजूदगी उन्हें वास्तव में ज्यादा सुरक्षित बना रही है या संघर्ष में उन्हें संभावित निशाना भी बना रही है।

हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी सैन्य अड्डों को हटाने जैसा फैसला तत्काल होने की संभावना कम है। खाड़ी देशों की सुरक्षा, हथियारों की आपूर्ति, मिसाइल डिफेंस और खुफिया सहयोग अभी भी काफी हद तक अमेरिका पर निर्भर है।

सऊदी अरब पर सबसे ज्यादा दबाव

मौजूदा संघर्ष में सऊदी अरब की स्थिति सबसे जटिल बनी हुई है। ईरान के अलावा इराक में सक्रिय ईरान समर्थित गुटों और यमन के हूती विद्रोहियों की गतिविधियों से भी सऊदी अरब की सुरक्षा और ऊर्जा अवसंरचना पर खतरा बढ़ा है।

हूती विद्रोहियों की गतिविधियों ने लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य को भी संवेदनशील बना दिया है। वहीं, होर्मुज जलडमरूमध्य में संकट के कारण सऊदी अरब के तेल निर्यात और ऊर्जा व्यापार पर अतिरिक्त दबाव बना हुआ है।

यही वजह है कि रियाद एक तरफ अमेरिका की नीतियों से नाराज है, तो दूसरी तरफ अपनी सुरक्षा के लिए उसी पर निर्भर भी है।

क्या खाड़ी देश अमेरिका से दूरी बना रहे हैं?

खाड़ी देशों के रुख में बदलाव के संकेत जरूर दिखाई दे रहे हैं, लेकिन इसे अमेरिका से पूर्ण दूरी के तौर पर देखना अभी जल्दबाजी होगी।

सऊदी अरब, तुर्किए और पाकिस्तान के बीच हुए रक्षा सहयोग को भी कुछ विशेषज्ञ खाड़ी देशों की बदलती सुरक्षा रणनीति के संकेत के रूप में देख रहे हैं। इसके जरिए क्षेत्रीय देश अपने सुरक्षा साझेदारों का दायरा बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि किसी एक शक्ति पर उनकी निर्भरता कम हो।

यानी संदेश यह है कि खाड़ी देश अमेरिका को छोड़ना नहीं चाहते, लेकिन उसके विकल्प तलाशने से भी पीछे नहीं हट रहे।

अमेरिका ने आरोपों को किया खारिज

वाशिंगटन की ओर से खाड़ी सहयोगियों के साथ रिश्तों में किसी बड़े संकट की बात को खारिज किया गया है। व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप के खाड़ी देशों के साथ मजबूत संबंध हैं और अमेरिका अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ लगातार संपर्क में है।

अमेरिकी पक्ष ने ईरान को भी क्षेत्रीय अस्थिरता के लिए जिम्मेदार बताया है और दावा किया है कि तेहरान अपनी गतिविधियों के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहले से ज्यादा अलग-थलग है।

‘युद्ध के बाद अमेरिका पर भरोसा घटा’

क्षेत्रीय विशेषज्ञों की राय हालांकि अलग है। उनका कहना है कि युद्ध के बाद खाड़ी देशों में अमेरिका की विश्वसनीयता को लेकर सवाल बढ़े हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक, खाड़ी देश अब इस बात पर विचार कर रहे हैं कि अमेरिकी सैन्य शक्ति पर पूरी तरह निर्भर रहने की रणनीति लंबे समय में उनके लिए कितनी सुरक्षित है।

सबसे बड़ी समस्या यह है कि अमेरिका से नाराजगी के बावजूद ईरान को लेकर खाड़ी देशों की अपनी सुरक्षा चिंताएं भी गंभीर हैं। इसलिए वे न तो अमेरिका को पूरी तरह छोड़ सकते हैं और न ही मौजूदा अमेरिकी नीति से संतुष्ट हैं।

खाड़ी की अर्थव्यवस्था पर भी मंडरा रहा संकट

अगर ईरान-अमेरिका संघर्ष लंबे समय तक जारी रहता है तो इसका असर केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं रहेगा। खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाएं भी इसकी चपेट में आ सकती हैं।

अक्टूबर से दिसंबर के बीच खाड़ी क्षेत्र में बड़े कारोबारी सम्मेलन, सांस्कृतिक कार्यक्रम और अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजन होते हैं। सुरक्षा अनिश्चितता के कारण इन आयोजनों पर भी असर पड़ने की आशंका है।

सऊदी अरब में अक्टूबर के अंत में होने वाला प्रमुख कारोबारी आयोजन भी इस बात का अहम परीक्षण होगा कि वैश्विक कंपनियां मौजूदा सुरक्षा माहौल के बीच खाड़ी क्षेत्र में निवेश और यात्रा को लेकर कितना भरोसा दिखाती हैं।

खाड़ी देशों के सामने सबसे बड़ा सवाल

मौजूदा संकट ने खाड़ी देशों के सामने एक बड़ा रणनीतिक सवाल खड़ा कर दिया है—क्या भविष्य में उनकी सुरक्षा सिर्फ अमेरिका के भरोसे रह सकती है?

फिलहाल जवाब आसान नहीं है। अमेरिका से नाराजगी बढ़ रही है, लेकिन उसके सैन्य, खुफिया और हथियार सहयोग का कोई तत्काल और समान स्तर का विकल्प भी मौजूद नहीं है।

यही विरोधाभास खाड़ी देशों की मौजूदा रणनीति को तय कर रहा है: अमेरिका से दूरी की तैयारी, लेकिन अमेरिका से पूरी तरह अलग होने की स्थिति अभी नहीं।

S

news desk

Recent Posts

राहुल गांधी ने CM हेमंत सोरेन को लिखा पत्र, बोले- छात्रों से खुद मिलिए और उनकी मांगों पर गौर कीजिए

नई दिल्ली: झारखंड के रांची में पिछले 20 दिनों से अधिक समय से जारी छात्र…

1 minute ago

CGL परीक्षा रद्द और CBI जांच की मांग पर अड़े छात्र, आज सोरेन सरकार से होगी निर्णायक वार्ता; क्या टलेगा 20 अगस्त का घेराव?

रांची: झारखंड में JPSC और JSSC भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ छात्रों का…

3 minutes ago

‘दिमागी नक्सल’ बयान पर BJP का पलटवार, सुधांशु त्रिवेदी बोले- चिदंबरम को किस बात का गर्व?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘दिमागी नक्सल’ वाले बयान को लेकर बीजेपी और कांग्रेस के बीच…

17 minutes ago

UGC-NET Re-Exam: दो महीने बाद NTA ने मानी प्रश्नपत्रों की गड़बड़ी, राहुल गांधी ने पूछा- छात्रों की गलती क्या?

UGC-NET जून 2026 के तीन विषयों की परीक्षा दोबारा कराने के फैसले पर कांग्रेस ने…

24 minutes ago

‘हथेली गरम, पुलिस नरम’… अखिलेश यादव का योगी सरकार पर हमला, बोले- भ्रष्टाचार के कारण पहले जेब देखती है पुलिस

लखनऊ: समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश की पुलिस व्यवस्था और कानून-व्यवस्था को…

40 minutes ago

‘ये शक्तिमान नहीं, बुद्धिहीन है’… मुकेश खन्ना के ‘जन गण मन’ को हटाकर ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान बनाने वाले बयान पर भड़के लोग

मुंबई: ‘शक्तिमान’ फेम अभिनेता मुकेश खन्ना एक बार फिर अपने बयान को लेकर चर्चा में…

46 minutes ago