अल्मोड़ा: उत्तराखंड की पहाड़ियों में कई ऐसे प्राचीन धार्मिक स्थल हैं, जिनसे जुड़ी मान्यताएं आज भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई हैं। अल्मोड़ा के पास स्थित त्रिनेत्रेश्वर और एकादश रुद्र महादेव मंदिर भी ऐसा ही एक प्राचीन धाम है। स्थानीय लोग इसे त्रिनेत्र महादेव मंदिर के नाम से जानते हैं। सुयाल नदी के किनारे पहाड़ों और हरियाली के बीच स्थित यह मंदिर अपनी प्राचीन वास्तुकला के साथ यहां मौजूद जलकुंड से जुड़ी मान्यताओं के लिए भी जाना जाता है।
बताया जाता है कि मंदिर परिसर का निर्माण 9वीं और 10वीं शताब्दी के बीच हुआ था। यहां करीब 16 प्राचीन शिव मंदिर हैं, जिनकी स्थापत्य शैली जागेश्वर धाम के मंदिरों से मिलती-जुलती नजर आती है। मंदिर परिसर से जुड़े कई ऐसे तथ्य और स्थानीय मान्यताएं हैं, जो इसे खास बनाते हैं।
मंदिर परिसर में बने प्राचीन देवालयों की सबसे खास बात उनका निर्माण है। इन मंदिरों को तराशे गए पत्थरों को एक-दूसरे के ऊपर रखकर बनाया गया है। इनके निर्माण में चूने या सीमेंट जैसे किसी मसाले का इस्तेमाल नहीं किया गया।
मुख्य मंदिर परिसर के पास एक छोटा पैदल पुल भी है। इसे पार करने के बाद आसपास बने कई अन्य प्राचीन मंदिर और देवालय दिखाई देते हैं। पत्थरों की बनावट और मंदिरों की शैली इस स्थान की पुरानी वास्तुकला की झलक देती है।
मंदिर परिसर में मौजूद कई दुर्लभ प्राचीन मूर्तियों और अवशेषों को सुरक्षा के लिहाज से एक छोटे कमरे में रखा गया है। श्रद्धालु और पर्यटक इन्हें बाहर लगी खिड़की से देख सकते हैं।
कुछ मंदिरों के ऊपरी हिस्से में लगे नक्काशीदार पत्थरों को नीचे फर्श पर स्थापित किया गया है। इन पत्थरों पर शिवलिंग भी बने हुए हैं, जिनकी श्रद्धालु पूजा करते हैं। मंदिरों के गर्भगृह में भगवान विष्णु, सूर्यदेव, लक्ष्मी-नारायण, कार्तिकेय और उमा-महेश की प्रतिमाएं स्थापित हैं।
बताया जाता है कि यहां कभी जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं भी मौजूद थीं। अब इन मूर्तियों को अल्मोड़ा संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है।
मंदिर परिसर में भगवान शिव और शेषनाग को समर्पित एक छोटा मंदिर भी है। इसी मंदिर के भीतर एक जलकुंड बना हुआ है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि इस कुंड के पानी का संबंध मौसम में होने वाले बदलाव से है।
उनका कहना है कि इलाके में भारी बारिश होने से कुछ दिन पहले ही कुंड का जलस्तर अपने आप बढ़ने लगता है। स्थानीय लोग इसे बारिश आने का प्राकृतिक संकेत मानते हैं और इस मान्यता पर लंबे समय से विश्वास करते आए हैं।
मंदिर से जुड़ी एक अन्य स्थानीय मान्यता भी काफी चर्चित है। पहाड़ी इलाके में लंबे समय तक बारिश न होने या सूखे की स्थिति बनने पर गांव के लोग इस छोटे मंदिर में एकत्र होते हैं।
इसके बाद भगवान शिव और शेषनाग का जलाभिषेक किया जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, पूजा के दो-तीन दिन बाद आसमान में बादल छाने लगते हैं और तेज बारिश होती है। यह परंपरा आज भी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।
मंदिर के पास से सुयाल नदी बहती है। नदी के बीच एक बड़ी चट्टान के पास पानी जमा होने से एक छोटा ताल जैसा स्थान बनता है, जिसे ब्रह्म कुंड कहा जाता है।
स्थानीय लोगों का विश्वास है कि ब्रह्म कुंड के पानी में औषधीय और दैवीय गुण हैं। मान्यता के अनुसार, यहां स्नान करने से त्वचा और शरीर से जुड़ी परेशानियां दूर होती हैं। मंदिर परिसर में समय-समय पर मरम्मत और रखरखाव का काम हुआ है, लेकिन इसके बावजूद यहां की प्राचीन स्थापत्य शैली आज भी अपनी पुरानी पहचान बनाए हुए है।
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