सेंसर बोर्ड के साथ 3 साल की लंबी कानूनी लड़ाई और 127 कट्स के विवाद के बाद आखिरकार शुक्रवार को रिलीज हुई दिलजीत दोसांझ की मोस्ट-अवेटेड फिल्म ‘सतलुज’ “पुराना नाम ‘पंजाब 95” एक बार फिर विवादों के घेरे में है। बिना किसी प्रायर प्रमोशन के OTT प्लेटफॉर्म ZEE5 पर अनकट रिलीज की गई इस फिल्म को महज 48 घंटों के अंदर, रविवार को भारत में प्लेटफॉर्म से अचानक हटा दिया गया। इस अनएक्सपेक्टेड ड्रॉप के बाद जहां सोशल मीडिया पर फैंस का गुस्सा फूट पड़ा है, वहीं पंजाब की राजनीति में एक बड़ा सियासी घमासान शुरू हो गया है।
फिल्म को अचानक हटा देने पर ZEE5 ने एक ऑफिशियल बयान जारी कर कहा, “मौजूदा घटनाक्रमों को देखते हुए, ‘सतलुज’ अगले आदेश तक भारत में उपलब्ध नहीं रहेगी। हालांकि, हम फिल्म के क्रिएटिव विजन के साथ मजबूती से खड़े हैं और उचित कानूनी प्रक्रियाओं के जरिए इसे जल्द से जल्द अपने दर्शकों के बीच वापस लाने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं।” आपको बता दें कि यह फिल्म भारत में भले ही बैन हो गई हो, लेकिन इंटरनेशनल मार्केट्स में अभी भी स्ट्रीम हो रही है।
फिल्म के हटने के तुरंत बाद शिरोमणि अकाली दल (SAD) और SGPC ने इस कदम की कड़े शब्दों में निंदा की है।
सुखबीर सिंह बादल (SAD प्रमुख): उन्होंने इस फैसले को सीधे तौर पर फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन पर हमला बताया। बादल ने कहा, “यह सिर्फ सेंसरशिप नहीं है, बल्कि हमारी सामूहिक यादों और सच्चाई को दबाने की कोशिश है। पंजाब अपने इतिहास को ईमानदारी से देखने का हकदार है।”
SGPC की अपील: शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के मुख्य सचिव कुलवंत सिंह मन्नान और अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज ने पंजाब के युवाओं से इस फिल्म को हर हाल में देखने की अपील की है, ताकि वे अपने इतिहास और सरदार जसवंत सिंह खालरा के सर्वोच्च बलिदान को समझ सकें।
कांग्रेस सांसद तारिक अनवर ने इस मुद्दे पर राजनीति न करने की सलाह देते हुए कहा कि अगर फिल्म फैक्ट्स पर बेस्ड है तो इसमें कोई बुराई नहीं है। वहीं, पंजाब के आम आदमी पार्टी के मंत्री अमन अरोड़ा ने कहा कि इतिहास के हर पहलू को सामने आना चाहिए, लेकिन उसे इस तरह पेश किया जाए जिससे आपसी भाईचारे को नुकसान न पहुंचे।
इस बैन के बाद फिल्म इंडस्ट्री और सोशल मीडिया पर ‘सच्चाई को न दबाने’ की एक मुहिम चल पड़ी है, दिलजीत दोसांझ का ने कहा की फिल्म के लीड एक्टर दिलजीत दोसांझ ने इस बैन के खिलाफ बेहद सॉलिड स्टैंड लिया है।
उन्होंने सोशल मीडिया पर राजस्थान में इस फिल्म की हो रही एक ओपन-एयर स्क्रीनिंग का वीडियो शेयर करते हुए पंजाबी में लिखा—
“हुण नी रुकनी फिल्म। खालरा साहब दी आवाज नू कोई नी दबा सकदा।” इससे पहले उन्होंने एक क्रिप्टिक पोस्ट में लिखा था, “मैं अंधेरे को चुनौती देता हूं। जो आज ‘सतलुज’ के साथ हुआ, वही इतिहास में शहीद जसवंत सिंह खालरा के साथ भी हुआ था।”
हनी त्रेहान के डायरेक्शन में बनी यह फिल्म पंजाब के मशहूर मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा की बायोपिक है। खालरा ने 1980 और 1990 के दशक में पंजाब में उग्रवाद के दौर के दौरान पुलिस द्वारा किए गए कथित फर्जी एनकाउंटर और हजारों लावारिस शवों के गुप्त रूप से किए गए अंतिम संस्कार के कड़वे सच को दुनिया के सामने रखा था। इसके बाद, 1995 में उनका खुद का अपहरण कर लिया गया और उनकी हत्या कर दी गई, जिसके आरोप में बाद में कई पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की सजा हुई।
फिल्म मेकर्स का दावा है कि इस कड़वे सच को दिखाने के कारण ही सेंसर बोर्ड ‘CBFC’ ने फिल्म में 127 कट्स लगाने, नाम बदलने और पंजाब के संदर्भों को हटाने का दबाव बनाया था। अब जब फिल्म बिना कट्स के OTT पर आई, तो इसे 48 घंटे भी टिकने नहीं दिया गया। फिलहाल, भले ही डिजिटल प्लेटफॉर्म से फिल्म गायब हो चुकी है, लेकिन इंटरनेट और ग्राउंड पर इसे लेकर शुरू हुई बहस अब और ज्यादा तेज हो गई है।
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