महिला अधिकारों और बॉडी ऑटोनॉमी को लेकर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने एक बेहद क्रांतिकारी और बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कोई महिला मां बनना चाहती है या नहीं, या उसे गर्भपात (अबॉर्शन) कराना है या नहीं, यह फैसला लेने का अंतिम और एकमात्र अधिकार सिर्फ उस महिला का है, पति का नहीं।
आधुनिक कानूनी विमर्श में इस फैसले को महिलाओं के प्रजनन अधिकारों “रीप्रोडक्टिव राइट्स” के लिए एक मील का पत्थर माना जा रहा है।
हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कानून के प्रोविजन्स को पूरी तरह क्लियर किया। अदालत ने कहा कि गर्भ को रखने या न रखने का ‘सेंसिटिव डिसीजन’ लेने के लिए महिला को अपने पति की लिखित या मौखिक सहमति ‘रिटेन या वर्बल कंसेंट’ लेने की कोई कानूनी आवश्यकता नहीं है। कोख में पल रहे बच्चे के भविष्य और अपने शरीर पर पहला और आखिरी हक महिला का ही रहेगा।
अपने फैसले में कोर्ट ने इस बात को भी हाइलाइट किया कि भारतीय संविधान हर नागरिक को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा के साथ जीने का अधिकार देता है। इसी के तहत महिलाओं को अपने रीप्रोडक्टिव सिस्टम और शरीर से जुड़े फैसले लेने की पूरी आजादी है। कानूनन कोई भी पुरुष या परिवार किसी महिला को उसकी मर्जी के बिना गर्भधारण करने या उसे गिराने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।
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