नई दिल्ली: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग 23 सितंबर 2026 को अमेरिका में मुलाकात करने वाले हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार, टैरिफ, रेयर अर्थ मिनरल्स और ईरान युद्ध जैसे कई अहम मुद्दे हैं, लेकिन इस हाईप्रोफाइल बैठक में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI सबसे महत्वपूर्ण विषयों में शामिल रहेगा। खास बात यह है कि दोनों नेता AI के विकास से ज्यादा उससे पैदा होने वाले संभावित सुरक्षा संकट पर चर्चा कर सकते हैं।
शी जिनपिंग के अमेरिका पहुंचने से पहले दोनों देशों के अधिकारियों के बीच लंबी बातचीत हुई। अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट और चीन के उप प्रधानमंत्री हे लिफेंग के बीच न्यूयॉर्क में करीब आठ घंटे तक बैठक चली। इस दौरान ट्रंप और जिनपिंग की मुलाकात के एजेंडे पर चर्चा हुई। इसमें द्विपक्षीय व्यापार, टैरिफ, रेयर अर्थ मिनरल्स, ईरान युद्ध के साथ AI और उससे जुड़े सुरक्षा जोखिमों को भी शामिल किया गया।
राष्ट्राध्यक्षों की बैठकों में व्यापार और कूटनीतिक रिश्तों पर चर्चा होना सामान्य है, लेकिन इस बार AI का एजेंडे में प्रमुख स्थान होना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका और चीन खुद AI तकनीक की दुनिया में एक-दूसरे के सबसे बड़े प्रतिस्पर्धी हैं।
अमेरिका और चीन के बीच ‘यूएस-चीन एआई डायलॉग’ शुरू करने को लेकर शुरुआती सहमति बनी है। इसका उद्देश्य AI से जुड़े मुद्दों पर दोनों देशों के बीच नियमित संवाद कायम करना है। इस व्यवस्था का प्रस्ताव अमेरिका की ओर से दिया गया है।
दोनों देश एक ऐसे सूचना तंत्र पर भी काम कर सकते हैं, जिसके जरिए AI से जुड़ी किसी बड़ी घटना या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने वाली स्थिति की जानकारी एक-दूसरे को तुरंत दी जा सके।
खास चिंता अनियंत्रित AI एजेंट्स और गैर-सरकारी समूहों की ओर से किए जा सकने वाले साइबर हमलों को लेकर है। यानी जिस AI तकनीक के विकास के लिए दोनों देश एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश कर रहे हैं, अब उसी तकनीक से पैदा होने वाले जोखिमों को लेकर संवाद की जरूरत महसूस की जा रही है।
ट्रंप और जिनपिंग की बातचीत में सेना में AI के इस्तेमाल का मुद्दा भी उठ सकता है। स्वचालित हथियारों से लेकर न्यूक्लियर कमांड सिस्टम और सैन्य फैसलों में AI की भूमिका जैसे विषयों पर चर्चा संभव है।
अमेरिका और चीन दोनों अपनी सैन्य क्षमताओं में AI का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं। ऐसे में AI आधारित किसी सिस्टम की गलती या गलत निर्णय गंभीर सैन्य स्थिति पैदा कर सकता है। इसी वजह से दोनों देशों के बीच AI के सैन्य इस्तेमाल को लेकर कुछ नियम या सीमाएं तय करने की जरूरत पर बातचीत हो सकती है।
इसके अलावा एडवांस्ड AI के जरिए हैकिंग और तकनीक की चोरी का मुद्दा भी महत्वपूर्ण रहेगा। अमेरिकी कंपनियां लंबे समय से चीन पर AI के जरिए उनके सिस्टम को निशाना बनाने और तकनीक हासिल करने की कोशिश के आरोप लगाती रही हैं। ट्रंप बातचीत में यह मुद्दा उठा सकते हैं।
AI की पूरी तकनीकी दौड़ में चिप और सेमीकंडक्टर की अहम भूमिका है। अमेरिका ने चीन के AI कार्यक्रम को सीमित करने के लिए चिप और सेमीकंडक्टर की आपूर्ति पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए हैं।
चीन इन प्रतिबंधों को हटाने की मांग कर सकता है। वहीं ट्रंप AI मॉडल की कथित कॉपी और अमेरिकी AI तकनीक के इस्तेमाल का मुद्दा उठा सकते हैं। अमेरिकी AI कंपनियां आरोप लगाती रही हैं कि चीन के डेवलपर उनके AI मॉडल की नकल करते हैं और उनकी क्षमताओं का गलत इस्तेमाल करते हैं।
इसलिए बैठक में AI तकनीक साझा करने से ज्यादा उसके इस्तेमाल, सुरक्षा और तकनीकी आपूर्ति से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है।
दोनों देशों के बीच AI को लेकर प्रतिस्पर्धा को समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि यह सिर्फ दो देशों की तकनीकी दौड़ नहीं है। इसके पीछे भविष्य की वैश्विक तकनीकी व्यवस्था को लेकर मुकाबला भी है।
अमेरिका के AI क्षेत्र में OpenAI, Anthropic, Google DeepMind, Meta और एक्स एआई जैसी बड़ी कंपनियां हैं। 2025 में अमेरिकी संस्थानों ने 59 AI मॉडल विकसित किए, जबकि चीन की कंपनियों ने 35 मॉडल बनाए।
स्टैनफोर्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक मार्च 2026 तक शीर्ष अमेरिकी और चीनी AI मॉडलों के प्रदर्शन के बीच अंतर सिर्फ 2.7 प्रतिशत रह गया था। यानी मॉडल की संख्या के मामले में अमेरिका आगे था, लेकिन शीर्ष मॉडलों की क्षमता के बीच अंतर काफी कम हो चुका था।
AI की ताकत सिर्फ मॉडल पर निर्भर नहीं करती। इसके लिए चिप, बिजली और डेटा सेंटर जैसे बुनियादी ढांचे भी बेहद महत्वपूर्ण हैं। सेमीकंडक्टर चिप के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र में अमेरिका की स्थिति मजबूत है, जबकि चीन अपनी घरेलू चिप तकनीक को तेजी से विकसित कर रहा है।
दूसरी तरफ बिजली उत्पादन के मामले में चीन को बड़ी बढ़त हासिल है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक चीन अगले पांच वर्षों में 3.4 टेरावॉट से अधिक ऊर्जा क्षमता जोड़ सकता है, जो अमेरिका की संभावित क्षमता वृद्धि से करीब छह गुना ज्यादा बताई जा रही है।
अमेरिका और चीन की असली प्रतिस्पर्धा सिर्फ बेहतर AI मॉडल बनाने तक सीमित नहीं है। दोनों देश अपने-अपने AI इकोसिस्टम को दुनिया के ज्यादा से ज्यादा देशों तक पहुंचाना चाहते हैं।
ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी AI इकोसिस्टम को दुनिया के दूसरे देशों तक पहुंचाने के लिए ‘अमेरिकन AI एक्सपोर्ट प्रोग्राम’ तैयार किया है। इसके तहत चिप, क्लाउड, AI मॉडल, साइबर सुरक्षा और एप्लिकेशन को एक साथ दूसरे देशों तक पहुंचाने का लक्ष्य है।
वहीं चीन कम लागत वाले AI मॉडल के जरिए अपने तकनीकी इकोसिस्टम का विस्तार करने की कोशिश कर रहा है।
मामला कुछ हद तक उसी तरह है जैसे आज दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में मोबाइल फोन के लिए अलग-अलग ऑपरेटिंग सिस्टम का इस्तेमाल होता है। जिस देश की AI तकनीक और उससे जुड़ा इकोसिस्टम दुनिया के ज्यादा देशों में स्वीकार किया जाएगा, उसके पास भविष्य की डिजिटल अर्थव्यवस्था पर ज्यादा प्रभाव डालने की क्षमता होगी।
AI की दौड़ में चीन से आगे रहने की कोशिश के साथ अमेरिका के सामने एक दूसरी चुनौती भी है। AI पर अमेरिका में निजी क्षेत्र की ओर से भारी निवेश हो रहा है।
AI डेवलपमेंट में अमेरिकी निजी निवेश करीब साढ़े 27 लाख करोड़ रुपये बताया गया है, जबकि चीन में निजी निवेश करीब सवा लाख करोड़ रुपये है। चीन अगले पांच वर्षों में डेटा सेंटर बनाने पर करीब 28 लाख करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बना रहा है। चीन की शीर्ष इंटरनेट कंपनियां AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर करीब साढ़े 6 लाख करोड़ रुपये खर्च करने वाली हैं।
इसके मुकाबले अमेरिका AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर करीब 48 लाख करोड़ रुपये खर्च करने की तैयारी में है।
लेकिन अमेरिका में ही कुछ निजी निवेशक AI के संभावित खतरों को लेकर चिंता जता रहे हैं। उनका तर्क है कि AI के विकास की रफ्तार भविष्य में गंभीर जोखिम पैदा कर सकती है और इसकी गति को नियंत्रित करने की जरूरत है।
यही वजह है कि ट्रंप के सामने AI को लेकर दोहरी चुनौती है। एक तरफ चीन तेजी से अपने AI कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहा है और दूसरी तरफ अमेरिका में AI के संभावित खतरों को लेकर बहस जारी है।
शी जिनपिंग के साथ बैठक से पहले ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म सोशल ट्रूथ पर AI को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने AI के खिलाफ उठाई जा रही चिंताओं की तुलना क्लाइमेट चेंज को लेकर होने वाली बहस से की और कहा कि वह AI डेवलपमेंट की रफ्तार कम नहीं करेंगे।
ट्रंप ने यह भी दोहराया कि AI के क्षेत्र में चीन से आगे रहना अमेरिका के लिए जरूरी है।
ऐसे में 23 सितंबर की बैठक में AI पर किसी बड़े तकनीकी सहयोग से ज्यादा ध्यान जोखिमों को नियंत्रित करने के लिए न्यूनतम सहमति बनाने पर हो सकता है। दोनों देश एक ऐसा तंत्र बनाने की कोशिश कर सकते हैं जिससे AI से जुड़े किसी बड़े सुरक्षा संकट की स्थिति में एक-दूसरे को समय रहते जानकारी दी जा सके।
हालांकि, ऐसी किसी सहमति का मतलब यह नहीं होगा कि अमेरिका और चीन के बीच AI की प्रतिस्पर्धा खत्म हो जाएगी। दोनों देशों की कोशिश अपने-अपने AI इकोसिस्टम को दुनिया के 170 से ज्यादा देशों तक पहुंचाने की है। यही वजह है कि ट्रंप-जिनपिंग की बैठक में AI सिर्फ तकनीक का मुद्दा नहीं, बल्कि भविष्य की डिजिटल अर्थव्यवस्था और वैश्विक तकनीकी व्यवस्था से जुड़ा विषय भी बन गया है।
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