नई दिल्ली: अमेरिका और इजरायल के साथ बढ़ते सैन्य तनाव के बीच ईरान ने अपनी मिसाइल क्षमता की एक ऐसी झलक दिखाई है, जिसने उसकी छिपी हुई सैन्य ताकत को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। ईरान ने जिस मिसाइल को ‘एंजल ऑफ डेथ’ यानी मौत का दूत बताया है, उसे लेकर वह दावा कर रहा है कि जरूरत पड़ने पर यह अमेरिका, इजरायल और उनके सहयोगियों के खिलाफ इस्तेमाल की जा सकती है।
ईरान का दावा है कि उसने अब तक अपनी कई मिसाइल क्षमताओं को सार्वजनिक नहीं किया है। इसी वजह से उसके भूमिगत मिसाइल ठिकानों और वहां मौजूद हथियारों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। दूसरी ओर, अमेरिकी कांग्रेस की गैर-दलीय संस्था CBO की रिपोर्ट में ईरान के साथ संघर्ष पर हुए भारी खर्च और अमेरिकी हथियार भंडार पर पड़े असर का जिक्र किया गया है।
ईरान और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष के बीच सामने आई रिपोर्ट में अब तक करीब 38 अरब डॉलर खर्च होने का उल्लेख किया गया है। इसके साथ अमेरिकी सैन्य संसाधनों को हुए नुकसान और हथियारों की खपत का भी जिक्र है।
इसी पृष्ठभूमि में ईरान अपनी मिसाइल क्षमताओं को लेकर लगातार संदेश दे रहा है। ईरान के मुताबिक उसके पास ऐसे हथियार मौजूद हैं, जिनका इस्तेमाल मौजूदा संघर्ष में अभी तक नहीं किया गया है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ईरान की सैन्य क्षमता को भारी नुकसान पहुंचाने का दावा करते रहे हैं। ऐसे में ईरान की ओर से अपनी छिपी मिसाइल क्षमताओं की झलक दिखाना एक अलग संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।
ईरान जिस मिसाइल को ‘एंजल ऑफ डेथ’ बता रहा है, उसका नाम सेजिल है। यह ईरान की लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल है।
ईरान का दावा है कि सेजिल की अलग-अलग पीढ़ियों को विकसित किया गया है और इसकी छठी पीढ़ी तक की मिसाइल तैयार है। हालांकि, इस कथित छठी पीढ़ी की मिसाइल को दुनिया के सामने पूरी तरह प्रदर्शित नहीं किया गया है। इसकी क्षमता और मारक दूरी को लेकर जो आंकड़े सामने आते हैं, उनमें भी कई दावे ईरानी पक्ष से जुड़े हैं।
ईरान का दावा है कि जून 2025 में अमेरिका और इजरायल के हमलों के जवाब में इसी मिसाइल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हालांकि, इन दावों को स्वतंत्र रूप से प्रमाणित किए जाने की स्थिति अलग विषय है।
ईरान से जुड़े दावों के मुताबिक, इस मिसाइल की अनुमानित मारक क्षमता करीब 2,500 किलोमीटर हो सकती है। इसके टर्मिनल चरण में इसकी रफ्तार करीब 17,000 किलोमीटर प्रति घंटा बताई जाती है।
सेजिल दो चरणों वाली ठोस ईंधन आधारित मिसाइल है। ठोस ईंधन तकनीक का एक फायदा यह है कि मिसाइल को लॉन्च करने से पहले लंबे समय तक ईंधन भरने की प्रक्रिया की जरूरत नहीं होती। इससे इसे अपेक्षाकृत तेजी से तैनात और लॉन्च किया जा सकता है।
इसी वजह से सेजिल को ईरान की रणनीतिक मिसाइल क्षमता का अहम हिस्सा माना जाता है। हालांकि, इसकी कथित नई पीढ़ियों की वास्तविक क्षमता को लेकर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी सीमित है।
सेजिल को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा इसकी रफ्तार और संभावित मैन्युवरिंग क्षमता को लेकर होती है। ईरान का दावा है कि इसकी कुछ क्षमताएं इसे मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम के लिए चुनौतीपूर्ण बना सकती हैं।
इजरायल के आयरन डोम और अमेरिका के पैट्रियट तथा थाड जैसे एयर डिफेंस सिस्टम अलग-अलग प्रकार के खतरों को रोकने के लिए बनाए गए हैं। किसी बैलिस्टिक मिसाइल को रोक पाना उसकी गति, उड़ान पथ, ऊंचाई और इस्तेमाल की गई तकनीक जैसे कई कारकों पर निर्भर करता है।
इसी वजह से सेजिल की वास्तविक क्षमता का आकलन केवल उसके नाम या ईरानी दावों के आधार पर करना मुश्किल है।
हवा में इसके संभावित मैन्युवरिंग प्रोफाइल की वजह से इसे कभी-कभी ‘डांसिंग मिसाइल’ भी कहा जाता है। हालांकि, इसके अलग-अलग अनौपचारिक नामों से ज्यादा महत्वपूर्ण इसकी वास्तविक तकनीकी क्षमता है।
ईरान की मिसाइल क्षमता का एक अहम हिस्सा उसके भूमिगत ठिकाने हैं। ईरान ने कई मौकों पर अपने अंडरग्राउंड मिसाइल बेस के वीडियो जारी किए हैं।
इन ठिकानों में मिसाइलों को जमीन के काफी नीचे रखा जाता है। कुछ भूमिगत सुविधाओं को इस तरह डिजाइन किए जाने का दावा किया जाता है कि वहां से मिसाइलों को सीधे लॉन्च किया जा सके।
यही वजह है कि किसी सैन्य अभियान में सिर्फ दिखाई देने वाले मिसाइल लॉन्चर या ठिकानों को निशाना बनाना पर्याप्त नहीं माना जाता। भूमिगत भंडारों में मौजूद हथियारों की वास्तविक संख्या और उनकी स्थिति का आकलन करना मुश्किल हो सकता है।
ईरान के पास सेजिल के अलावा भी कई बैलिस्टिक और हाइपरसोनिक मिसाइलें हैं। इनमें से कुछ का इस्तेमाल या परीक्षण सार्वजनिक रूप से सामने आ चुका है, जबकि कुछ की वास्तविक तैनाती को लेकर जानकारी सीमित है।
कासिम बशीर को ईरान की नई मिसाइलों में शामिल बताया जाता है। इसका परीक्षण मई 2025 में किया गया था। इसकी अनुमानित रेंज 1,700 से 2,000 किलोमीटर बताई जाती है और यह करीब 500 किलोग्राम का वारहेड ले जाने में सक्षम बताई गई है।
इसमें टर्मिनल सीकर तकनीक होने का दावा किया जाता है, जिसका उद्देश्य लक्ष्य तक पहुंचने के अंतिम चरण में मिसाइल की सटीकता बढ़ाना है।
फतेह-2 को ईरान की हाइपरसोनिक मिसाइल क्षमता से जोड़कर देखा जाता है। इसकी बताई गई रेंज करीब 500 किलोमीटर है।
हाइपरसोनिक गति और संभावित मैन्युवरिंग क्षमता के कारण इस तरह के हथियार पारंपरिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम के लिए चुनौती पैदा कर सकते हैं। हालांकि, किसी विशेष मिसाइल की वास्तविक क्षमता उसके परीक्षण परिणाम और युद्ध में प्रदर्शन से ही बेहतर तरीके से आंकी जा सकती है।
ईरान की मिसाइल क्षमता की चर्चा के बीच अमेरिका के सामने युद्ध की लागत और हथियारों की खपत भी बड़ा मुद्दा है।
CBO की रिपोर्ट में ईरान के साथ संघर्ष में अमेरिकी हथियार भंडार पर पड़े असर का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस्तेमाल किए गए हथियारों के भंडार को दोबारा तैयार करने में कई साल लग सकते हैं।
डिफेंस सेक्टर में नए हथियारों का ऑर्डर देने से लेकर उनका उत्पादन और डिलीवरी पूरी होने तक लंबा समय लग सकता है। ऐसे में संघर्ष समाप्त होने के बाद भी हथियारों की कमी का असर अमेरिकी सैन्य तैयारियों पर पड़ सकता है।
CBO के मुताबिक, अगर ईरान के साथ सैन्य संघर्ष आगे भी जारी रहता है तो अमेरिका को हर महीने करीब 2 से 3 अरब डॉलर अतिरिक्त खर्च करने पड़ सकते हैं।
इसमें इस्तेमाल किए गए हथियारों और सैन्य उपकरणों की दोबारा खरीद, सैन्य विमानों की अतिरिक्त उड़ानें, सैन्य अभियानों की लागत और बढ़ी हुई ईंधन जरूरतें शामिल हैं।
यानी ईरान की मिसाइल क्षमता का सवाल सिर्फ इस बात तक सीमित नहीं है कि उसके पास कितने हथियार बचे हैं। इसके साथ यह भी जुड़ा है कि अमेरिका और उसके सहयोगियों को इन हथियारों का मुकाबला करने में कितने संसाधन खर्च करने पड़ रहे हैं।
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि ईरान अपनी किन मिसाइल क्षमताओं को आगे संघर्ष में इस्तेमाल करेगा। लेकिन सेजिल समेत उसकी लंबी दूरी की मिसाइलों और भूमिगत हथियार भंडार को लेकर सामने आ रहे दावे यह संकेत देते हैं कि क्षेत्र में सैन्य तनाव के बीच मिसाइल क्षमता आने वाले समय में भी अहम भूमिका निभा सकती है।
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