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युद्ध टालने की आखिरी कोशिश ? ओमान में डी-एस्केलेशन पर बात करेंगे अमेरिका-ईरान

मस्कट : मध्य पूर्व में हालात पहले से ही बेहद संवेदनशील बने हुए हैं और इसी बीच अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर एक अहम कूटनीतिक पहल सामने आई है। क्षेत्रीय अधिकारियों के मुताबिक, दोनों देश शुक्रवार (6 फरवरी 2026) को ओमान में बातचीत करने जा रहे हैं। इस वार्ता का मकसद फिलहाल किसी बड़े समझौते से ज्यादा हालात को बिगड़ने से रोकना यानी डी-एस्केलेशन है। यह बातचीत ऐसे वक्त हो रही है जब अमेरिका ने इलाके में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा दी है और युद्ध की आशंका को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता।

टूटे समझौते से यहां तक का सफर

इस पूरी कहानी की जड़ 2015 के JCPOA परमाणु समझौते में है। उस वक्त ईरान ने अपने न्यूक्लियर प्रोग्राम पर लगाम लगाने पर सहमति दी थी और बदले में उस पर लगे कड़े आर्थिक प्रतिबंध हटाए गए थे। लेकिन 2018 में डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को इस समझौते से बाहर निकाल लिया और “मैक्सिमम प्रेशर” की नीति अपनाई। इसका असर ईरान की अर्थव्यवस्था पर पड़ा और जवाब में उसने यूरेनियम संवर्धन बढ़ा दिया, जो अब हथियार-ग्रेड के काफी करीब बताया जा रहा है। 2022 में बाइडेन प्रशासन के दौरान वियना में बातचीत की कोशिश हुई, लेकिन आपसी अविश्वास के चलते वह भी ठंडे बस्ते में चली गई।

ओमान में वार्ता और आगे की राह

अब ट्रंप की वापसी के बाद माहौल फिर सख्त हो गया है। ट्रंप चेतावनी दे चुके हैं कि समझौता नहीं हुआ तो हालात और बिगड़ सकते हैं, जबकि ईरान भी अपने “रेड लाइन” से पीछे हटने को तैयार नहीं दिखता। ईरान के कहने पर बातचीत की जगह इस्तांबुल से बदलकर ओमान की गई है, साथ ही ईरान ने बातचीत का एजेंडा सिर्फ परमाणु मुद्दे तक सीमित रखने की बात कही है, जबकि अमेरिका बैलिस्टिक मिसाइल और क्षेत्रीय प्रॉक्सी ग्रुप्स (जैसे हिजबुल्लाह, हूती) जैसे अन्य मुद्दों को भी शामिल करना चाहता है।

यह वार्ता अप्रत्यक्ष होगी, जिसमें ओमान मध्यस्थ की भूमिका निभाएगा। अमेरिकी पक्ष से विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और ईरान की ओर से विदेश मंत्री अब्बास अराघची शामिल होंगे। शुरुआती लक्ष्य किसी तरह की डी-एस्केलेशन घोषणा पर सहमति बनाना है। अगर इसमें सफलता मिलती है तो आगे की बातचीत का रास्ता खुलेगा, नहीं तो मध्य पूर्व में तनाव और बढ़ सकता है।

news desk

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