नई दिल्ली : अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुई ताज़ा ट्रेड डील ने भारत-अमेरिका रिश्तों को नई दिशा देने का दावा तो किया है, लेकिन देश के भीतर इसे लेकर सियासी तूफान खड़ा हो गया है। इस समझौते के तहत अमेरिका ने भारतीय सामानों पर टैरिफ 50 फीसदी से घटाकर करीब 18 फीसदी कर दिया है, जबकि भारत ने अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाएं कम करने का वादा किया है। ऊर्जा, रक्षा और टेक्नोलॉजी के साथ-साथ कृषि को भी इस डील में शामिल किया गया है, और यहीं से सबसे बड़ा विवाद शुरू होता है। अमेरिकी कृषि मंत्री ब्रुक रोलिंस का इसे अमेरिकी किसानों के लिए “बड़ी जीत” बताना भारतीय किसानों की चिंता और बढ़ा रहा है।
अमेरिका को फायदा, भारत पर दबाव
यह समझौता लंबे समय से चल रही बातचीत का नतीजा बताया जा रहा है। अमेरिका भारत के साथ अपने कृषि व्यापार घाटे को कम करना चाहता था, जो 2024 में करीब 1.3 अरब डॉलर था। अमेरिका भारत की बड़ी आबादी को अपने कृषि उत्पादों के लिए बड़ा बाजार मानता है। मक्का, सोयाबीन, डेयरी जैसे उत्पादों के ज़रिए अमेरिकी किसान ज्यादा मुनाफा कमाना चाहते हैं। भारत सरकार का कहना है कि डेयरी जैसे संवेदनशील सेक्टर को बचाया गया है, लेकिन जानकार मानते हैं कि सीमित खुलाव भी भारतीय किसानों के लिए जोखिम भरा साबित हो सकता है।
सस्ते आयात से किसानों की कमर पर मार
भारत में खेती सिर्फ एक सेक्टर नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों की जिंदगी है। अमेरिका अपने किसानों को भारी सब्सिडी देता है, जिससे वहां के कृषि उत्पाद सस्ते पड़ते हैं। अगर ऐसे सस्ते उत्पाद भारतीय बाजार में आते हैं, तो स्थानीय किसानों के लिए मुकाबला करना बेहद मुश्किल होगा। मक्का, सोयाबीन तेल जैसे उत्पादों की कीमतें गिर सकती हैं, जिससे छोटे और मझोले किसानों की आय सीधे प्रभावित होगी। डेयरी सेक्टर में भी डर है कि विदेशी उत्पादों की एंट्री से छोटे डेयरी किसान बाजार से बाहर हो सकते हैं।
विपक्ष का हमला: “सेल इंडिया” और “कैपिटुलेशन” का आरोप
इस समझौते को लेकर विपक्ष ने सरकार पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस ने इसे “सेल इंडिया”, “कैपिटुलेशन” और किसानों के हितों के खिलाफ करार दिया है।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने ट्रंप के ऐलान पर तंज कसते हुए कहा कि यह “मोगंबो खुश हुआ” वाला मामला है और प्रधानमंत्री मोदी ने इसमें “समर्पण” कर दिया है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब ऐलान अमेरिका से हो रहा है, तो भारत की स्थिति कमजोर क्यों दिख रही है।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी सरकार पर तीखा वार किया। उन्होंने कहा कि मोदी जी “घबराए हुए हैं” और भारी दबाव में इस डील पर साइन किया गया है। राहुल गांधी का आरोप है कि अमेरिका के साथ ट्रेड डील में भारत के किसानों की मेहनत और खून-पसीना बेच दिया गया है। उन्होंने यहां तक कहा कि यह सिर्फ किसानों को नहीं, बल्कि पूरे देश को बेचने जैसा है, और इसी डर से उनकी बनाई हुई इमेज का “गुब्बारा” फूट सकता है।
शशि थरूर ने समझौते की पूरी जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की और कहा कि सांसदों और जनता को यह जानने का हक है कि इसका किसानों पर क्या असर पड़ेगा।
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इसे किसानों के खिलाफ “धोखा” और “बेट्रेयल” बताया। उन्होंने कहा कि भारतीय बाजार को अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए खोलना उस 70 फीसदी आबादी की आजीविका से खिलवाड़ है, जो खेती पर निर्भर है। उन्होंने डेयरी सेक्टर पर पड़ने वाले खतरे को भी गंभीर बताया।
आगे क्या?
सरकार का दावा है कि किसानों के हितों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा और जरूरत पड़ी तो सुरक्षा उपाय किए जाएंगे। लेकिन सियासी बयानबाजी और विशेषज्ञों की चेतावनियों के बीच एक बात साफ है—इस डील का असली असर आने वाले महीनों में ही दिखेगा। अगर संतुलन नहीं साधा गया, तो यह समझौता ग्रामीण भारत के लिए बड़ा संकट बन सकता है और एक बार फिर खेती देश की सबसे बड़ी राजनीतिक लड़ाई का केंद्र बन सकती है।