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चुनाव से पहले नया विवाद! क्या Greenland प्लान से अर्थव्यवस्था की नाकामी छुपाना चाहते हैं ट्रंप?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपने बयानों और फैसलों को लेकर सुर्खियों में हैं। इस बार मामला दुनिया के सबसे बड़े द्वीप ग्रीनलैंड का है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप ने संयुक्त विशेष अभियान कमांड (JSOC) को ग्रीनलैंड पर संभावित सैन्य हमले की योजना बनाने का निर्देश दिया है। यह खबर ऐसे वक्त आई है जब ट्रंप लगातार यह दावा करते रहे हैं कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद अहम है और जरूरत पड़ी तो उस पर कब्जा किया जा सकता है। हालांकि, अमेरिकी सेना के शीर्ष अधिकारी इस पूरे विचार से असहमत नजर आ रहे हैं और इसे कानून के खिलाफ बता रहे हैं।

ट्रंप का ग्रीनलैंड प्रेम पुराना है

ट्रंप का ग्रीनलैंड को लेकर आकर्षण कोई नई बात नहीं है। 2019 में अपने पहले कार्यकाल के दौरान उन्होंने डेनमार्क से ग्रीनलैंड खरीदने की पेशकश की थी, जिसे डेनमार्क सरकार ने साफ शब्दों में खारिज कर दिया था। अब 2026 में हालात एक बार फिर गर्म हैं। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार करने वाली सफल अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के बाद ट्रंप के करीबी सलाहकार, खासकर स्टीफन मिलर जैसे ‘हॉक’ माने जाने वाले नेता, इस योजना को आगे बढ़ाने के पक्ष में हैं। ट्रंप का मानना है कि आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन का बढ़ता प्रभाव अमेरिका के लिए खतरा है और ग्रीनलैंड पर नियंत्रण से इस चुनौती को रोका जा सकता है। इसके अलावा, ग्रीनलैंड में मौजूद दुर्लभ खनिज और उसका रणनीतिक स्थान भी इस दिलचस्पी की बड़ी वजह माने जा रहे हैं।

सेना के अंदर ही उठ रहे सवाल

दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप की इस सोच का सबसे कड़ा विरोध खुद अमेरिकी सेना के भीतर से हो रहा है। जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के कई सदस्यों ने इसे ‘पागलपन’ और ‘अवैध’ करार दिया है। सेना के शीर्ष अधिकारियों का कहना है कि बिना कांग्रेस की मंजूरी के ऐसा कोई भी सैन्य कदम उठाना संभव नहीं है। साथ ही, यह नाटो संधि का भी खुला उल्लंघन होगा, क्योंकि ग्रीनलैंड डेनमार्क का हिस्सा है और डेनमार्क नाटो का सदस्य देश है। सूत्रों के मुताबिक, सैन्य अधिकारी ट्रंप को ग्रीनलैंड की बजाय दूसरे मुद्दों पर ध्यान देने की सलाह दे रहे हैं, जैसे रूसी ‘घोस्ट शिप्स’ को रोकना या ईरान से जुड़ी रणनीतियां।

डेनमार्क से यूरोप तक नाराजगी

इस खबर के सामने आते ही डेनमार्क और ग्रीनलैंड की सरकारों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेट्टे फ्रेडरिकसन ने साफ चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका किसी नाटो सहयोगी पर हमला करता है, तो हालात बेहद गंभीर हो जाएंगे। ब्रिटेन ने भी दो टूक कहा है कि वह ग्रीनलैंड पर किसी भी हमले के लिए अमेरिका को अपनी सैन्य सुविधाएं इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं देगा। यूरोप के कई नेता इस पूरे घटनाक्रम को नाटो के लिए खतरा मान रहे हैं और आशंका जता रहे हैं कि ट्रंप का असली मकसद नाटो को कमजोर करना हो सकता है।

ग्रीनलैंड में करीब 57 हजार लोग रहते हैं और यह डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है। अमेरिका पहले से ही 1951 की संधि के तहत यहां पिटुफिक स्पेस बेस (पहले थुले एयर बेस) संचालित करता है, जहां 100 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। ट्रंप प्रशासन के विदेश मंत्री मार्को रुबियो का कहना है कि ग्रीनलैंड को हासिल करने के लिए ‘खरीद’ को प्राथमिक विकल्प माना जा रहा है, लेकिन सैन्य रास्ते को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह पूरा विवाद अमेरिका में होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले आर्थिक मुद्दों से ध्यान हटाने की कोशिश भी हो सकता है। अगर ट्रंप इस योजना पर आगे बढ़ते हैं, तो इसका असर सिर्फ नाटो तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था भी खतरे में पड़ सकती है। फिलहाल, सबकी नजरें अमेरिकी कांग्रेस और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की अगली प्रतिक्रिया पर टिकी हैं।

news desk

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