नई दिल्ली। भारतीय चुनाव व्यवस्था में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनका जिक्र चुनाव आयोग की भूमिका और चुनावी सुधारों की चर्चा के बिना पूरा नहीं होता। टीएन शेषन उन्हीं नामों में शामिल हैं। 12 दिसंबर 1990 से 11 दिसंबर 1996 तक भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे शेषन ने चुनावी नियमों को लागू कराने के लिए सख्त रुख अपनाया। चुनाव आयोग की आधिकारिक ऐतिहासिक सामग्री भी उनके कार्यकाल को Model Code of Conduct के कठोर क्रियान्वयन और चुनावों को अधिक स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय बनाने की कोशिशों से जोड़ती है।
शेषन के दौर में चुनाव आयोग केवल चुनाव की तारीखों और मतदान की प्रक्रिया तक सीमित संस्था के तौर पर नहीं, बल्कि चुनावी नियमों के पालन की निगरानी करने वाली संवैधानिक संस्था के रूप में ज्यादा मुखर दिखाई दिया।
टीएन शेषन की सबसे ज्यादा चर्चा Model Code of Conduct यानी आदर्श आचार संहिता के सख्त क्रियान्वयन को लेकर हुई।
चुनाव आयोग के इतिहास से जुड़े दस्तावेज के मुताबिक, शेषन ने आचार संहिता को सख्ती से लागू करने की रणनीति अपनाई और इसके उल्लंघन पर कार्रवाई को सार्वजनिक रूप से भी प्रमुखता दी।
उनके कार्यकाल में चुनावी प्रचार, सरकारी मशीनरी के इस्तेमाल और चुनावी नियमों के उल्लंघन को लेकर आयोग के हस्तक्षेप के कई उदाहरण सामने आए। सुप्रीम कोर्ट के 1995 के फैसले में भी शेषन के कार्यकाल के दौरान आचार संहिता के सख्त पालन और उल्लंघन पर कार्रवाई का उल्लेख मिलता है।
शेषन के कार्यकाल की सबसे चर्चित घटनाओं में 1991 का पटना लोकसभा चुनाव शामिल है।
20 मई 1991 को मतदान के बाद चुनाव आयोग को बड़े पैमाने पर बूथ कैप्चरिंग, मतदान केंद्रों पर कब्जे, मतपत्रों को जबरन अपने नियंत्रण में लेने, मतदाताओं को मतदान से रोकने और धमकाने जैसी शिकायतें मिलीं। आयोग ने उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर माना कि चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं रहा और 21 मई 1991 को पटना लोकसभा सीट का चुनाव काउंटरमैंड कर दिया। आदेश पर तत्कालीन CEC टीएन शेषन के हस्ताक्षर थे।
यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि आयोग ने प्रभावित मतदान को केवल कुछ बूथों तक सीमित मानने के बजाय पूरे निर्वाचन की प्रक्रिया को दोबारा शुरू करने का रास्ता चुना।
शेषन के कार्यकाल में चुनावी सुरक्षा को लेकर भी चुनाव आयोग और सरकार के बीच टकराव देखने को मिला।
2 अगस्त 1993 को आयोग ने पर्याप्त सुरक्षा और अर्धसैनिक बल उपलब्ध कराने में आ रही कठिनाइयों का हवाला देते हुए देश के विभिन्न क्षेत्रों में होने वाले उपचुनावों को 18 दिसंबर 1993 तक स्थगित करने का आदेश दिया था। इस आदेश का असर तमिलनाडु की रानीपेट विधानसभा और पलानी लोकसभा सीट पर भी पड़ा। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। कोर्ट ने माना कि चुनाव कराने के लिए आवश्यक सुरक्षा व्यवस्था के आकलन और मतदान की तारीख तय करने में चुनाव आयोग की महत्वपूर्ण संवैधानिक भूमिका है।
यानी सुरक्षा व्यवस्था को चुनाव की निष्पक्षता से जोड़ते हुए आयोग ने मतदान की तारीख को आगे बढ़ाने का अधिकार इस्तेमाल किया।
आचार संहिता के उल्लंघन पर शेषन के रुख का एक और उदाहरण हरियाणा की कालका विधानसभा सीट और तमिलनाडु की रानीपेट विधानसभा सीट से जुड़ा है।
उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक इन सीटों के चुनावों को आचार संहिता से जुड़े उल्लंघनों के कारण स्थगित/काउंटरमैंड किया गया था। सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में भी कालका और तमिलनाडु के चुनावों को लेकर शेषन की कार्रवाई का उल्लेख मिलता है।
शेषन के दौर में Electors Photo Identity Card यानी EPIC को चुनावी प्रक्रिया में व्यापक रूप से आगे बढ़ाया गया।
चुनाव आयोग के आधिकारिक इतिहास के मुताबिक, शेषन का मानना था कि मतदाता फोटो पहचान पत्र चुनाव प्रक्रिया में पहचान संबंधी गड़बड़ियों को कम करने में मदद कर सकता है। 1993 में चुनाव के लिए तैयार राज्यों में EPIC कार्यक्रम को आगे बढ़ाया गया और इसके क्रियान्वयन को लेकर आयोग तथा राजनीतिक दलों के बीच विवाद भी हुआ।
आज EPIC यानी Voter ID चुनावी पहचान के प्रमुख दस्तावेजों में शामिल है। हालांकि मतदान का अधिकार मूल रूप से मतदाता सूची में नाम दर्ज होने से जुड़ा है, केवल Voter ID कार्ड होने से किसी व्यक्ति को वोट देने का अधिकार स्वतः नहीं मिलता।
शेषन के कार्यकाल में चुनाव आयोग ने Observers की भूमिका को भी ज्यादा महत्वपूर्ण बनाया।
चुनाव आयोग की आधिकारिक सामग्री के अनुसार, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने की कोशिशों के दौरान ऑब्जर्वरों की भूमिका बढ़ी और बाद में 1996 में Representation of the People Act में Section 20B के जरिए उन्हें वैधानिक आधार मिला।
इससे चुनाव प्रक्रिया की निगरानी को सिर्फ स्थानीय प्रशासन पर निर्भर रहने के बजाय आयोग की प्रत्यक्ष निगरानी से जोड़ने की दिशा मजबूत हुई।
शेषन का कार्यकाल सिर्फ चुनावी नियमों के कठोर पालन तक सीमित नहीं था। उन्होंने चुनाव आयोग की संवैधानिक भूमिका और संस्थागत स्वतंत्रता पर भी जोर दिया।
इसी दौरान चुनाव आयोग को बहुसदस्यीय संस्था बनाने को लेकर बड़ा संवैधानिक विवाद हुआ। अक्टूबर 1993 में दो चुनाव आयुक्त नियुक्त किए गए और शेषन ने इस व्यवस्था को चुनौती दी। मामला सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ तक पहुंचा। 1995 के फैसले ने चुनाव आयोग को एक बहुसदस्यीय संस्था के रूप में काम करने की संवैधानिक व्यवस्था को बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट ने बाद के फैसलों में भी इस बात पर जोर दिया कि संविधान ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था को सौंपी है।
टीएन शेषन का कार्यकाल इसलिए अलग माना जाता है क्योंकि उन्होंने चुनाव आयोग के पास मौजूद संवैधानिक शक्तियों को मैदान में लागू करने पर जोर दिया। आचार संहिता के पालन से लेकर बूथ कैप्चरिंग के खिलाफ कार्रवाई, चुनावी सुरक्षा, मतदाता पहचान और चुनाव पर्यवेक्षकों की भूमिका तक कई क्षेत्रों में उनके कार्यकाल ने चुनाव प्रशासन की बहस को प्रभावित किया।
पटना लोकसभा चुनाव को काउंटरमैंड करने और सुरक्षा व्यवस्था के सवाल पर चुनाव टालने जैसे फैसले उनके सख्त प्रशासनिक दृष्टिकोण के प्रमुख उदाहरण हैं।
इसी वजह से आज भी जब भारत में चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, आचार संहिता के पालन और चुनावी निष्पक्षता पर चर्चा होती है, तो टीएन शेषन का कार्यकाल अक्सर एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संदर्भ के तौर पर सामने आता है।
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