नई दिल्ली: ईरान-अमेरिका तनाव के चलते वैश्विक स्तर पर ईंधन आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। कई देशों में तेल संकट की आशंका गहराने लगी है, लेकिन दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक देश चीन इस संकट के बीच अपेक्षाकृत बेफिक्र नजर आ रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह चीन में तेल की मांग में आई बड़ी गिरावट है, जिसने वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों पर भी असर डाला है।
चीन में तेल की खपत में आई कमी किसी महामारी, लॉकडाउन या आर्थिक सुस्ती का परिणाम नहीं है। इसके पीछे लोगों की बदलती जीवनशैली, परिवहन के नए विकल्प और इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती हिस्सेदारी को प्रमुख कारण माना जा रहा है। यही वजह है कि पहले के मुकाबले चीन की ईंधन जरूरतों में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है।
चीन की सबसे बड़ी पेट्रोकेमिकल कंपनी सिनोपेक के आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल में पेट्रोल की बिक्री में सालाना आधार पर 8 फीसदी और डीजल की बिक्री में 6 फीसदी की कमी दर्ज की गई। वहीं, गोल्डमैन सैक्स के अनुमान के अनुसार पेट्रोल आधारित उत्पादों की खपत में करीब 20 फीसदी तक गिरावट देखने को मिली है।
परिवहन के नए मॉडल ने बदली तस्वीर
चीन में लोग पहले की तरह यात्रा तो कर रहे हैं, लेकिन उन्होंने ईंधन बचाने वाले परिवहन साधनों को तेजी से अपनाया है। इससे तेल की मांग पर सीधा असर पड़ा है और पारंपरिक ईंधनों पर निर्भरता कम हुई है।
रेलवे बना लोगों की पहली पसंद
चीन के परिवहन मंत्रालय के अनुसार मार्च और अप्रैल के दौरान रेल यात्राओं में सालाना आधार पर 10 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। यह वृद्धि पिछले वर्ष की तुलना में दोगुनी है, क्योंकि पिछले साल इसी अवधि में रेल यात्राओं में केवल 5 फीसदी बढ़ोतरी हुई थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि तेज, सस्ती और सुविधाजनक रेल सेवाओं ने बड़ी संख्या में लोगों को निजी वाहनों से दूर किया है, जिससे ईंधन की खपत में कमी आई है।
इलेक्ट्रिक वाहनों का बढ़ता दबदबा
चीन में इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती लोकप्रियता भी तेल की मांग में गिरावट का बड़ा कारण बनकर उभरी है। कई शहरों में मेट्रो सेवाएं और टैक्सी नेटवर्क पूरी तरह इलेक्ट्रिक व्यवस्था पर आधारित हो चुके हैं।
चीन चार्जिंग एलायंस के आंकड़ों के अनुसार अप्रैल में इलेक्ट्रिक वाहनों की चार्जिंग गतिविधियां पिछले साल के मुकाबले 69 फीसदी बढ़कर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गईं। वहीं, परिवहन मंत्रालय ने बताया कि मई दिवस की छुट्टियों के दौरान हाईवे पर चलने वाले कुल वाहनों में लगभग 25 फीसदी वाहन इलेक्ट्रिक या हाइब्रिड श्रेणी के थे।
महंगे तेल की जगह पुराने भंडार पर भरोसा
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के लगभग बंद होने से वैश्विक तेल आपूर्ति पर दबाव बढ़ गया है। इसके बावजूद चीन ने महंगे दामों पर तेल खरीदने के बजाय अपने पुराने रणनीतिक भंडार का इस्तेमाल शुरू कर दिया है।
जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें कम थीं, तब चीन ने बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का भंडारण किया था। अब वही भंडार देश की जरूरतों को पूरा करने में मदद कर रहा है।
आठ साल के निचले स्तर पर पहुंचा तेल आयात
चीन के तेल आयात में भी बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। मई महीने में देश का कच्चे तेल का आयात 29 फीसदी घटकर 7.8 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया, जो पिछले आठ वर्षों का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है।
इससे पहले अप्रैल में भी तेल आयात में 20 फीसदी की कमी दर्ज की गई थी। लगातार गिरती मांग और वैकल्पिक ऊर्जा साधनों के बढ़ते उपयोग ने चीन की आयात जरूरतों को काफी कम कर दिया है।
रियल एस्टेट संकट ने भी घटाई डीजल की खपत
पेट्रोल के साथ-साथ डीजल की मांग में आई कमी के पीछे चीन का लंबे समय से जारी रियल एस्टेट संकट भी एक महत्वपूर्ण वजह माना जा रहा है।
जानकारी के अनुसार स्थानीय सरकारी निर्माण परियोजनाएं बजट की कमी और बढ़ती लागत के दबाव में हैं, जिससे निर्माण कार्यों में डीजल की खपत घटी है। वहीं, लॉजिस्टिक्स और खनन क्षेत्र से जुड़े कई कारोबारियों ने अपने डीजल ट्रकों को इलेक्ट्रिक ट्रकों से बदलना शुरू कर दिया है। इसका असर भी डीजल की मांग पर साफ दिखाई दे रहा है।
दुनिया के लिए मिसाल बन सकता है चीन का मॉडल
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि रेल नेटवर्क के विस्तार, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा और रणनीतिक तेल भंडारण जैसी नीतियों ने चीन को वैश्विक तेल संकट के असर से काफी हद तक बचाए रखा है। ऐसे में चीन का यह मॉडल भविष्य में अन्य देशों के लिए भी एक अहम उदाहरण बन सकता है।