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महाकाल भक्ति पर फतवे की राजनीति ! नुसरत भरूचा के महाकाल दर्शन ने क्यों छेड़ दी मजहब बनाम संविधान की बहस?

news desk
Last updated: January 1, 2026 12:52 pm
news desk
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नुसरत भरूचा के महाकाल दर्शन ने क्यों छेड़ दी बहस
नुसरत भरूचा के महाकाल दर्शन ने क्यों छेड़ दी बहस
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बॉलीवुड एक्ट्रेस नुसरत भरूचा की ‘महाकाल भक्ति’ ने साल की शुरुआत में ही एक बड़ा धार्मिक और आइडियोलॉजिकल बवंडर खड़ा कर दिया है। उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में नुसरत का जलाभिषेक करना कुछ लोगो को रास नहीं आ रहा है। आलम ये है कि अभिनेत्री की आस्था अब ‘मजहबी रार’ और ‘फतवे वाली राजनीति’ के बीच फंस गई है।

गुनाह किया है, तौबा करो!
बरेली के प्रभावशाली धर्मगुरु और ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने इस मामले में बेहद सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने नुसरत के मंदिर जाने को महज एक पसंद नहीं, बल्कि ‘गुनाह-ए-अजीम’ करार दिया।
उन्होंने आगे ये भी कहा की ‘इस्लाम में बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) की जगह नहीं है। नुसरत ने तिलक लगाकर और पूजा कर अपनी सीमाओं को लांघा है। उन्हें तुरंत ‘तौबा’ करनी चाहिए और दोबारा ‘कलमा’ पढ़कर मजहब में लौटना चाहिए’।

तो वही दूसरी तरफ, उज्जैन के संत समाज ने नुसरत के समर्थन में ‘संवैधानिक ढाल’ तैयार कर ली है। जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर शैलेशानंद महाराज ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भगवान महाकाल ‘कालों के काल’ हैं, वे किसी एक धर्म के नहीं, पूरी मानवता के हैं। संतों का तर्क है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहाँ आर्टिकल 25 हर किसी को अपनी पसंद की इबादत का हक देता है।

‘शांति की तलाश और अटूट आस्था’
कंट्रोवर्सीज़ के शोर के बीच नुसरत भरूचा का अंदाज काफी शांत लेकिन प्रभावी रहा। उन्होंने किसी भी विवाद में उलझने के बजाय अपनी ‘Inner Peace’ पर ध्यान दिया। मीडिया से बात करते हुए उन्होंने साफ कहा, ‘यहाँ (महाकाल) आकर जो सुकून मिलता है, वो शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता’। नुसरत का ये बयान उन लोगों के लिए एक सीधा मेसेज है जो उनकी आस्था को मजहब के तराजू में तौल रहे हैं।

सोशल मीडिया बना अखाड़ा
X और इंस्टाग्राम पर यूजर्स दो धड़ों में बंट गए हैं, कोई उन्हें ‘आधुनिक भारत’ का चेहरा बता रहा है। तो वही कुछ लोग उनके पुराने वीडियो खंगाल कर उन्हें ‘नमाज’ और ‘शरीयत’ की दुहाई दे रहा है।

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