मुंबई: महाराष्ट्र सरकार अब सरकारी जमीन पर संचालित जिमखानों और क्लबों को लेकर बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है। राज्य सरकार ऐसी नई नीति तैयार कर रही है, जिसके तहत इन संस्थानों की कार्यप्रणाली, सदस्यता प्रक्रिया और जमीन के उपयोग की व्यापक समीक्षा की जाएगी। सरकार का फोकस सार्वजनिक जमीनों पर नियंत्रण मजबूत करने, आम लोगों की पहुंच बढ़ाने और राजस्व व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने पर है।
यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब हाल के वर्षों में सार्वजनिक जमीनों के उपयोग को लेकर लगातार बहस तेज हुई है। माना जा रहा है कि सरकार अब उन संस्थानों पर भी विशेष ध्यान दे रही है, जिन्हें दशकों पहले रियायती शर्तों पर सरकारी जमीन उपलब्ध कराई गई थी।
राजस्व एवं वन विभाग ने इसी वर्ष फरवरी में एक अध्ययन समूह का गठन किया था। इस समूह को राज्यभर के जिमखानों और क्लबों की मौजूदा व्यवस्था का मूल्यांकन करने और भविष्य की नीति को लेकर सुझाव देने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
सरकार यह समझने की कोशिश कर रही है कि सार्वजनिक जमीन पर संचालित इन संस्थानों को अधिक समावेशी कैसे बनाया जाए और आम नागरिकों को भी उनकी सुविधाओं का लाभ किस प्रकार उपलब्ध कराया जा सके।
प्रस्तावित नीति के तहत क्लबों और जिमखानों की सदस्यता प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने पर जोर दिया जा रहा है। साथ ही उनकी वित्तीय संरचना और राजस्व मॉडल की भी समीक्षा की जाएगी।
सरकार का मानना है कि सार्वजनिक संसाधनों पर संचालित संस्थानों में जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ाना जरूरी है। इसी दिशा में सदस्यता नियमों और संचालन व्यवस्था में बदलाव पर विचार किया जा रहा है।
मुंबई जैसे महानगर में जहां खुले स्थानों की कमी लगातार चिंता का विषय बनी हुई है, वहीं बड़ी मात्रा में जमीन जिमखानों और विशिष्ट क्लबों के पास मौजूद है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार शहर के कुल खुले क्षेत्र का बड़ा हिस्सा जिमखानों और क्लबों के नियंत्रण में है। ऐसे में सार्वजनिक उपयोग और जमीन के बेहतर प्रबंधन को लेकर सरकार गंभीरता से विचार कर रही है।
मुंबई में मौजूद कई प्रतिष्ठित क्लबों की सदस्यता प्राप्त करना आम लोगों के लिए बेहद कठिन माना जाता है। कुछ क्लबों में सदस्यता शुल्क करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है, जबकि सदस्य बनने के लिए कई बार दो दशक से अधिक समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है।
यही वजह है कि लंबे समय से इन संस्थानों को सीमित और संपन्न वर्ग तक केंद्रित सुविधाओं के रूप में देखा जाता रहा है।
मुंबई के 20 प्रमुख जिमखानों में से 16 ऐसे हैं जो कलेक्टर की जमीन पर संचालित हो रहे हैं। इन जमीनों को वर्षों पहले बेहद कम दरों पर लीज पर दिया गया था।
हाल ही में प्रशासन ने इन सभी जिमखानों के प्रतिनिधियों को बैठक के लिए बुलाया है। इस दौरान जमीन के उपयोग, लीज शर्तों और वर्तमान संचालन व्यवस्था से जुड़ी जानकारी जुटाई जा रही है। माना जा रहा है कि यह प्रक्रिया नई नीति के मसौदे का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है।
सरकारी अधिकारियों की कई टीमों ने हाल ही में संबंधित जिमखानों का निरीक्षण किया। जांच के दौरान जमीन के रिकॉर्ड, वास्तविक उपयोग और किसी भी प्रकार के अनधिकृत निर्माण या बदलाव की पड़ताल की गई।
प्रशासन इन निरीक्षणों की रिपोर्ट तैयार कर रहा है, जिसके आधार पर आगे की कार्रवाई और नीति निर्धारण किया जा सकता है।
सूत्रों के अनुसार सरकार लीज और लाइसेंस फीस की मौजूदा व्यवस्था की भी समीक्षा कर रही है। भविष्य में क्लब परिसरों में आयोजित होने वाले विवाह समारोह, कॉन्सर्ट, बैंक्वेट और अन्य व्यावसायिक आयोजनों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की संभावना पर भी विचार किया जा रहा है।
यदि ऐसा होता है तो सार्वजनिक जमीन के व्यावसायिक उपयोग को लेकर नए नियम लागू हो सकते हैं और सरकार के राजस्व में भी वृद्धि हो सकती है।
सरकार की इस पहल की तुलना महालक्ष्मी रेसकोर्स मामले से भी की जा रही है। वर्ष 2024 में बृहन्मुंबई नगर निगम ने रेसकोर्स की बड़ी जमीन अपने नियंत्रण में लेकर उसे सार्वजनिक उपयोग के लिए विकसित करने की प्रक्रिया शुरू की थी।
अब माना जा रहा है कि जिमखानों और क्लबों को लेकर तैयार की जा रही नई नीति भी उसी व्यापक सोच का हिस्सा है, जिसमें सार्वजनिक जमीनों का उपयोग अधिक से अधिक लोगों के हित में सुनिश्चित करने पर जोर दिया जा रहा है।
नई नीति लागू होने के बाद सदस्यता नियमों, लीज शर्तों, शुल्क संरचना और सार्वजनिक पहुंच से जुड़े कई बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। फिलहाल सरकार विभिन्न पहलुओं का अध्ययन कर रही है, लेकिन संकेत साफ हैं कि आने वाले समय में मुंबई और महाराष्ट्र के प्रतिष्ठित जिमखानों की कार्यप्रणाली में महत्वपूर्ण परिवर्तन संभव हैं।
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