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ठंड का महाद्वीप बना तपता तंदूर! 1300 से ज्यादा मौतें, पिघलती सड़कें-उखड़ती पटरियां… जानिए यूरोप में क्यों मचा गर्मी का महाविनाश

नई दिल्ली: जिस तापमान को भारत में सामान्य गर्मी माना जाता है, वही इस समय यूरोप के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। पूरे यूरोप में भीषण हीटवेव ने हालात बिगाड़ दिए हैं और अब तक 1300 से अधिक लोगों की मौत की खबर सामने आ चुकी है। कई देशों में सड़कें पिघलने लगी हैं, रेलवे ट्रैक उखड़ रहे हैं, स्कूल और दफ्तर बंद किए जा रहे हैं और लोग रातें समुद्र किनारे बिताने को मजबूर हैं। सवाल यह है कि आखिर यूरोप में यह गर्मी इतनी खतरनाक क्यों बन गई?

यूरोप में टूट गए गर्मी के कई दशक पुराने रिकॉर्ड

यूरोप में इस बार गर्मी ने पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। फ्रांस में वर्ष 1947 के बाद पहली बार तापमान 44.3 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। रिपोर्ट के मुताबिक, अकेले फ्रांस में 1000 से अधिक लोगों की मौत दर्ज की गई। इनमें एक मामला 18 महीने के बच्चे की कार में फंसने से मौत का भी बताया गया। इसके अलावा गर्मी से राहत पाने के लिए जलाशयों में उतरने के दौरान 55 लोगों की जान चली गई।

जर्मनी में भी तापमान 41 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच गया। गर्मी का असर इतना गंभीर रहा कि रेलवे ट्रैक प्रभावित होने लगे और कई ट्रेन सेवाओं पर असर पड़ा। वहीं जंगलों में आग लगने की घटनाएं भी सामने आईं।

पोलैंड में 105 साल पुराना तापमान रिकॉर्ड टूट गया, जहां 40.5 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। ब्रिटेन में जून महीने का रिकॉर्ड टूटा और तापमान 36.1 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। चेक गणराज्य की राजधानी प्राग में लोगों को राहत देने के लिए सार्वजनिक स्थानों पर पानी का छिड़काव किया गया।

भारत में सामान्य, यूरोप में जानलेवा क्यों बन रही यही गर्मी?

भारत और यूरोप के बीच सबसे बड़ा अंतर उनकी भौगोलिक स्थिति को माना जा रहा है। भारत में सूरज की किरणें अधिक सीधी और लंबे समय तक पड़ती हैं, इसलिए यहां अधिक तापमान लंबे समय से सामान्य जलवायु का हिस्सा रहा है।

वहीं यूरोप अपेक्षाकृत ठंडे मौसम वाला क्षेत्र माना जाता है, जहां सामान्य परिस्थितियों में तापमान कम रहता है। इसी कारण वहां के लोग, शहर और बुनियादी ढांचा अत्यधिक गर्मी के अनुकूल नहीं हैं। यही वजह है कि 35 से 40 डिग्री सेल्सियस जैसी गर्मी भी वहां गंभीर स्वास्थ्य संकट पैदा कर देती है।

घरों की बनावट भी बन रही खतरे की वजह

यूरोप में अधिकांश घर ठंड से बचाने के हिसाब से बनाए जाते हैं ताकि अंदर की गर्माहट लंबे समय तक बनी रहे। लेकिन यही संरचना गर्मी के दौरान उल्टा असर दिखाती है। दीवारें और छतें गर्मी को भीतर रोक लेती हैं और रात के समय भी राहत नहीं मिलती।

इसके कारण लोगों के शरीर को तापमान से उबरने का मौका नहीं मिलता और हीट स्ट्रोक, थकावट, डिहाइड्रेशन और हृदय संबंधी समस्याएं बढ़ने लगती हैं।

एसी की कमी और बुजुर्ग आबादी ने बढ़ाई मुश्किल

यूरोप में एयर कंडीशनर का उपयोग कई देशों में सीमित है। बताया गया कि पूरे यूरोप में केवल करीब 20 प्रतिशत घरों में ही एसी उपलब्ध हैं, जबकि ब्रिटेन में यह आंकड़ा और भी कम है। कई सार्वजनिक संस्थानों, स्कूलों और अस्पतालों में भी शीतलन व्यवस्था सीमित बताई गई है।

इसके साथ ही यूरोप की बड़ी आबादी बुजुर्गों की है। 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों का अनुपात अधिक होने के कारण गर्मी का असर ज्यादा गंभीर रूप में सामने आ रहा है। कई बुजुर्ग अकेले रहते हैं, जिससे समय पर मदद मिलना भी चुनौती बन जाता है।

ओमेगा ब्लॉक ने रोकी ठंडी हवाएं, हीट डोम ने बढ़ाया तापमान

विशेषज्ञों के मुताबिक इस भीषण गर्मी के पीछे ओमेगा ब्लॉक बड़ी वजह माना जा रहा है। यह एक ऐसा हाई प्रेशर सिस्टम है जिसने मौसम की सामान्य गति को प्रभावित कर दिया है। इसके कारण अफ्रीका से आने वाली गर्म हवाएं यूरोप में फंस गईं और ठंडी हवाओं का प्रवेश सीमित हो गया।

इसके साथ ही हीट डोम जैसी स्थिति भी बनी, जिसमें ऊपर बना दबाव गर्म हवा को नीचे दबाता रहता है। इससे तापमान लगातार बढ़ता जाता है और बादल बनने की संभावना कम हो जाती है।

ग्लोबल वॉर्मिंग ने बढ़ाई खतरे की तीव्रता

विशेषज्ञों का मानना है कि ओमेगा ब्लॉक और हीट डोम जैसी मौसमी घटनाएं पहले भी होती थीं, लेकिन ग्लोबल वॉर्मिंग ने इनके प्रभाव को अधिक गंभीर बना दिया है। यूरोप को दुनिया के सबसे तेजी से गर्म होने वाले महाद्वीपों में गिना जा रहा है और यहां तापमान वृद्धि वैश्विक औसत से अधिक गति से दर्ज की जा रही है।

यूरोप में मौजूदा संकट केवल अधिक तापमान का मामला नहीं माना जा रहा, बल्कि इसके पीछे जलवायु परिवर्तन, भौगोलिक परिस्थितियां, शहरी संरचना, सीमित शीतलन व्यवस्था और बदलते मौसम पैटर्न जैसे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं।

 

vineet verma

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