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यूपी पुलिस के ‘ऑपरेशन लंगड़ा’ पर हाई कोर्ट का ‘हंटर’! क्या बनाए नये नियम, अफसरों की होगी गाइडलाइन?

उत्तर प्रदेश में अपराधियों के पैर में गोली मारने के बढ़ते चलन यानी ‘हाफ एनकाउंटर’ पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपना ‘कानूनी चाबुक’ चला दिया है। कोर्ट ने बेहद कड़े शब्दों में पुलिस को उसकी मर्यादा याद दिलाते हुए कहा है कि ‘गोली चलाना पुलिस का काम नहीं है, और सजा सुनाना सिर्फ अदालत का अधिकार है’।

फेम और मेडल की भूख पर कोर्ट का तंज
जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल ने पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि ‘आज एनकाउंटर एक ‘रूटीन’ बन गया है। उन्होंने साफ कहा कि पुलिस अधिकारी सोशल मीडिया पर ‘सिंघम’ वाली इमेज बनाने के चक्कर में कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं। सीनियर अफसरों की चापलूसी और ‘आउट ऑफ टर्न’ प्रमोशन पाने के लिए अपराधियों को अपंग बनाया जा रहा है। बिना किसी बड़े खतरे के अपराधियों के पैर में गोली मारना सीधे-सीधे मानवाधिकारों का हनन है।’

अब ‘कप्तान’ को देना होगा जवाब
कोर्ट ने इस बार केवल निचले अधिकारियों पर नहीं, बल्कि सीधे जिले के SP, SSP और कमिश्नर पर निशाना साधा है। कोर्ट का आदेश है कि ‘अगर एनकाउंटर की कहानी फर्जी निकली या नियमों का पालन नहीं हुआ, तो कंटेंप्ट की कार्रवाई जिले के सबसे बड़े पुलिस अधिकारी पर होगी और ये भी कहा की अब कोई भी कप्तान यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकेगा कि उसे घटना की जानकारी नहीं थी’।

एनकाउंटर के बाद अब क्या होगा? नया नियम
कोर्ट ने 6-सूत्रीय फॉर्मूला जारी किया है जो यूपी पुलिस के लिए अब ‘लक्ष्मण रेखा’ की तरह होगा:

1- एनकाउंटर करने वाली टीम खुद अपनी जांच नहीं करेगी। जांच CB-CID या दूसरे थाने की टीम करेगी।

2- एनकाउंटर के तुरंत बाद वीरता पदक या प्रमोशन बांटने की प्रथा पर रोक लगा दी गई है। जब तक जांच में वीरता 100 प्रतिशत साबित नहीं होगी तब तक कोई रिवॉर्ड नहीं मिलेगा।

3- घायल आरोपी का बयान अब पुलिस नहीं, बल्कि मजिस्ट्रेट या डॉक्टर लेंगे ताकि पुलिस दबाव न बना सके।

4- अगर अपराधी के परिवार को लगता है कि जांच गलत है, तो वे सीधे सेशन जज के पास जा सकते हैं।

बैकफुट पर विभाग
इस मामले की गंभीरता इतनी थी कि यूपी के DGP राजीव कृष्ण और अपर मुख्य सचिव संजय प्रसाद को खुद कोर्ट के सामने पेश होना पड़ा। उन्होंने भरोसा दिया है कि अब हर थाने में सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का सख्ती से पालन होगा।

news desk

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