देश की राजनीति में इस वक्त सबसे बड़ा राजनीतिक खेल शुरू हो चुका है। एक ऐसा खेल, जो सिर्फ अगले चुनाव नहीं, बल्कि 2029 की पूरी राजनीति का भविष्य तय कर सकता है। सबसे बड़ा सवाल यही है-क्या बीजेपी के खिलाफ बिखरा हुआ विपक्ष फिर से एक मंच पर आ पाएगा? और अगर आएगा भी, तो उसका चेहरा कौन होगा?
एक तरफ राहुल गांधी लगातार विपक्षी दलों को साथ लाने की कोशिश कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ INDIA गठबंधन के अंदर ही दरारें खुलकर सामने आने लगी हैं। तमिलनाडु में कभी कांग्रेस की सबसे मजबूत सहयोगी रही DMK अब कांग्रेस पर ही सवाल उठा रही है। उदयनिधि स्टालिन खुले मंच से कह चुके हैं कि कांग्रेस पर भरोसा नहीं करना चाहिए। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अभिनेता विजय की पार्टी TVK के उभरने के बाद कांग्रेस और DMK के रिश्तों में दूरी बढ़ने लगी है।
लेकिन सवाल सिर्फ तमिलनाडु तक सीमित नहीं है। बंगाल में ममता बनर्जी की TMC पहले से ही कांग्रेस से दूरी बनाकर अपनी अलग राजनीति करती रही है। INDIA गठबंधन में शामिल होने के बावजूद कई राज्यों में TMC और कांग्रेस एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ती दिखाई दीं। ममता बनर्जी हमेशा कहती रही हैं कि क्षेत्रीय दलों को ज्यादा ताकत मिलनी चाहिए और कांग्रेस अब पहले जैसी मजबूत पार्टी नहीं रही।
हालांकि अब बंगाल की राजनीति में तस्वीर थोड़ी बदलती दिखाई दे रही है। बड़े राजनीतिक झटकों के बाद ममता बनर्जी का रुख पहले से नरम नजर आ रहा है। जो ममता हर मुद्दे पर सबसे तेज बयान देती थीं, वही अब कई विवादों पर शांत दिखाई देती हैं। हाल ही में बंगाल में बकरीद विवाद पर राजनीति गरमाई, लेकिन ममता की तरफ से कोई बड़ा बयान नहीं आया। ऐसे में सवाल उठ रहा है-क्या अब ममता बनर्जी फिर से INDIA गठबंधन के करीब आएंगी? क्या उन्हें एहसास हो रहा है कि बीजेपी के खिलाफ अकेले लड़ना आसान नहीं होगा?
यही वजह है कि राहुल गांधी का हालिया बयान काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जब बंगाल में TMC की हार पर कुछ विपक्षी नेता खुशी मना रहे थे, तब राहुल गांधी ने साफ कहा कि विपक्ष को एक-दूसरे की हार पर खुश नहीं होना चाहिए, क्योंकि असली लड़ाई बीजेपी की बढ़ती ताकत से है। राहुल गांधी का संदेश साफ था अगर कांग्रेस, TMC, समाजवादी पार्टी और बाकी विपक्षी दल आपस में ही लड़ते रहे, तो सबसे ज्यादा फायदा बीजेपी को होगा।
अब जरा उत्तर प्रदेश की तरफ देखिए। 2027 विधानसभा चुनाव धीरे-धीरे राष्ट्रीय राजनीति का अगला सबसे बड़ा रण बनता जा रहा है। 2017 में अखिलेश यादव और राहुल गांधी साथ आए थे। “UP को ये साथ पसंद है” वाला नारा भी खूब चला, लेकिन गठबंधन बुरी तरह हार गया। सपा सिर्फ 47 सीटों पर सिमट गई और कांग्रेस को सिर्फ 7 सीटें मिलीं।
लेकिन 2024 लोकसभा चुनाव में तस्वीर थोड़ी बदलती दिखी। सपा और कांग्रेस फिर साथ आए और बीजेपी को यूपी में पहले जैसा दबदबा बनाने से रोक दिया। यही वजह है कि अब 2027 के लिए फिर गठबंधन की चर्चा तेज हो गई है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल अभी भी वही है-क्या सिर्फ गठबंधन बना लेने से बीजेपी को हराया जा सकता है? क्योंकि बीजेपी अब सिर्फ एक राजनीतिक पार्टी नहीं, बल्कि एक बेहद मजबूत चुनावी संगठन बन चुकी है। उसके पास मजबूत कैडर, बूथ नेटवर्क, हिंदुत्व नैरेटिव और प्रधानमंत्री मोदी का चेहरा है।
वहीं विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती है-सीट शेयरिंग, नेतृत्व और आपसी भरोसा। हर राज्य में विपक्ष का चेहरा अलग है और हर पार्टी अपनी राजनीतिक जमीन बचाने में लगी हुई है।
अब देखना यही होगा कि क्या विपक्ष सच में एकजुट हो पाएगा, या फिर यही अंदरूनी लड़ाई बीजेपी को और मजबूत कर देगी। आने वाले चुनाव सिर्फ सरकार नहीं तय करेंगे, बल्कि भारत की विपक्षी राजनीति का भविष्य भी तय करेंगे।