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अल-अक्सा मस्जिद पर सबसे बड़ा भू-राजनीतिक संकट! क्या ‘मल्टी-फेथ सेंटर’ में बदलेगा इस्लाम का तीसरा सबसे पवित्र स्थल? जानें इनसाइड स्टोरी

Al-Aksa Mosque New Status Quo Row: यरुशलम की ऐतिहासिक अल-अक्सा मस्जिद (Al-Aqsa Mosque) को लेकर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों से एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है।

मिडिल ईस्ट आई (MEE) की एक खोजी रिपोर्ट ने दावा किया है कि अमेरिका और इजराइल मिलकर अल-अक्सा मस्जिद से जॉर्डन (Jordan) की ऐतिहासिक संरक्षक भूमिका को हमेशा के लिए खत्म करने की एक बड़ी गुप्त योजना पर काम कर रहे हैं।

इस नई योजना के तहत अल-अक्सा मस्जिद के मौजूदा स्वरूप और व्यवस्था को पूरी तरह बदलकर इसे मुस्लिम, ईसाई और यहूदियों के लिए एक ‘मल्टी-फेथ सेंटर’ (साझा धार्मिक व पर्यटन स्थल) के रूप में पेश करने की तैयारी है।

कुशनर और हकाबी का ‘गुप्त दस्तावेज’: क्या है अमेरिका का प्लान?

रिपोर्ट में अमेरिकी, जॉर्डन, फिलिस्तीनी और खाड़ी देशों के अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि इस संवेदनशील योजना के पीछे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर और इजराइल में अमेरिकी राजदूत माइक हकाबी का दिमाग है।

योजना के 3 सबसे बड़े और विवादित बिंदु:

  1. यहूदियों को प्रार्थना का अधिकार: अब तक की व्यवस्था के मुताबिक, गैर-मुस्लिम परिसर में आ सकते हैं लेकिन उन्हें प्रार्थना की अनुमति नहीं है। नए प्रस्ताव में यहूदियों को बड़े समूहों में आधिकारिक तौर पर प्रार्थना की अनुमति देने की बात है।
  2. जॉर्डन समर्थित वक्फ की छुट्टी: मस्जिद का प्रबंधन संभालने वाले जॉर्डन समर्थित ‘इस्लामिक वक्फ’ की भूमिका को खत्म कर इजराइल सरकार के सहयोग से एक नई संस्था बनाई जाएगी।
  3. खुत्बे और नियुक्तियों पर इजराइल का सेंसर: मस्जिद के इमामों और धार्मिक उपदेशकों की नियुक्ति में इजराइल का सीधा दखल होगा। यहाँ तक कि शुक्रवार के ‘खुत्बे’ (धार्मिक भाषण) की सामग्री पर भी इजराइल की मंजूरी अनिवार्य की जा सकती है।

खाड़ी देशों में रोटेशन का फॉर्मूला: सऊदी अरब ने खड़ी की दीवार

पश्चिमी और जॉर्डन के सूत्रों के अनुसार, अमेरिका ने इस योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए बहरीन, मिस्र, मोरक्को और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे देशों को बारी-बारी से मस्जिद परिसर की निगरानी सौंपने का प्रस्ताव दिया है।

हालांकि, मध्य पूर्व की सबसे बड़ी ताकत सऊदी अरब इस प्रस्ताव के पूरी तरह खिलाफ खड़ा हो गया है। सऊदी सूत्रों का स्पष्ट कहना है कि:

  • क्षेत्र में शांति और स्थिरता के लिए जॉर्डन की संरक्षक भूमिका का बने रहना अनिवार्य है।
  • यदि जॉर्डन को इस भूमिका से हटाया गया, तो पूरे मिडिल ईस्ट में तनाव और हिंसा की एक नई लहर भड़क सकती है।


क्या है अल-अक्सा का ‘स्टेटस क्वो’?

  • 1924 से जॉर्डन का संरक्षण: जॉर्डन का हाशमी शाही परिवार 1924 से यरुशलम के मुस्लिम और ईसाई पवित्र स्थलों का संरक्षक रहा है, जिसे 1994 की इजराइल-जॉर्डन शांति संधि में भी मान्यता मिली थी।
  • 1967 की सहमति: 1967 के युद्ध के बाद तय हुआ था कि अंदरूनी व्यवस्था वक्फ देखेगा और बाहरी सुरक्षा इजराइल संभालेगा।
  • धार्मिक महत्व: मुसलमानों के लिए यह तीसरा सबसे पवित्र स्थल है, जबकि यहूदियों के लिए यह ‘टेंपल माउंट’ है, जहाँ उनके दो प्राचीन मंदिर हुआ करते थे।


अमेरिका ने दावों को किया खारिज

इस विस्फोटक रिपोर्ट के पब्लिश होने के बाद व्हाइट हाउस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। अमेरिकी अधिकारी का कहना है कि यह रिपोर्ट पूरी तरह गलत है और वाशिंगटन, जॉर्डन से उसकी संरक्षक भूमिका छीनने की कोई कोशिश नहीं कर रहा है।

news desk

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