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Supreme Court Status: ‘सलवार उतारना और छाती दबाना…’ पटना HC के फैसले पर भड़का सुप्रीम कोर्ट, जजों को लगाई कड़ी फटकार!

Highlights

  • यौन अपराधों में पटना और इलाहाबाद हाई कोर्ट की टिप्पणियों पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) सख्त।
  • सीजेआई (CJI) सूर्यकांत की दो टूक— “जजों की भी जिम्मेदारी है कि वे रिसर्च करें, स्टाफ पर निर्भर न रहें।”
  • देश की सभी अदालतों और पुलिस स्टेशनों को ‘यौन संवेदनशीलता हैंडबुक’ का सख्ती से पालन करने का निर्देश।

Supreme Court on Patna High Court Verdict: न्यायिक संवेदनशीलता पर देश की सबसे बड़ी अदालत सख्त

नई दिल्ली। देश में महिलाओं के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों के मामलों में अदालतों की संवेदनशीलता को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। पटना हाई कोर्ट (Patna High Court) के एक हालिया और बेहद विवादित फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी नाराजगी जताते हुए जजों को कड़ी फटकार लगाई है।

यह मामला तब तूल पकड़ गया जब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील शोभा गुप्ता ने कोर्ट को बताया कि 9 जुलाई को पटना हाई कोर्ट ने एक आरोपी की सजा रद्द करते हुए टिप्पणी की थी कि ‘किसी महिला की सलवार उतारना और उसकी छाती दबाना बलात्कार (रेप) की कोशिश का अपराध नहीं माना जाएगा।’ इस टिप्पणी पर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सभी अदालतों के लिए एक सख्त गाइडलाइन जारी कर दी है।

CJI सूर्यकांत का जजों पर बड़ा बयान- ‘रिसर्च खुद करें, स्टाफ कुछ नहीं कर रहा’

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस वी. मोहना ने सवाल उठाया कि क्या पटना हाई कोर्ट ने फैसला सुनाते समय सुप्रीम कोर्ट के उन पुराने आदेशों और गाइडलाइंस का अध्ययन नहीं किया था, जिसमें जजों को ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर सचेत रहने की हिदायत दी गई थी?

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की तल्ख टिप्पणी:

भारत के मुख्य न्यायाधीश ने पटना हाई कोर्ट के आदेश का जिक्र करते हुए साफ लफ्जों में कहा कि जजों की भी यह निजी जिम्मेदारी है कि वे संवेदनशील मामलों में फैसले देने से पहले खुद कुछ रिसर्च करें। उन्होंने नाराजगी जताते हुए कहा, “स्टाफ कुछ नहीं कर रहा है।”

सुप्रीम कोर्ट ने देश की सभी अदालतों और सभी राज्यों के पुलिस थानों को निर्देश दिया है कि वे एफआईआर (FIR) दर्ज करते समय, चार्जशीट दाखिल करते समय और फैसला सुनाते समय ‘यौन संवेदनशीलता हैंडबुक’ (Judicial Sensitivity Handbook) का अक्षरशः पालन करें।

क्या था इलाहाबाद और पटना हाई कोर्ट का वो विवादित मामला?

दरअसल, यह पूरा स्वतः संज्ञान (Suo Motu) का मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट के 17 मार्च, 2025 के एक आदेश से शुरू हुआ था, जिसमें कहा गया था कि किसी लड़की के पजामे का नाड़ा खींचना और उसके स्तनों को पकड़ना रेप की कोशिश नहीं है। इसी कड़ी में अब पटना हाई कोर्ट के जस्टिस पूर्णेंदु सिंह ने साल 2008 के एक फोटोग्राफी स्टूडियो वाले केस में आरोपी की रेप की कोशिश वाली सजा को रद्द कर दिया।

पटना हाई कोर्ट का तर्क

हाई कोर्ट ने कहा कि आरोपी ने महिला को स्टूडियो में बंद किया, उसकी सलवार उतारी और छाती दबाकर छेड़छाड़ की। लेकिन चूंकि रिकॉर्ड में कोई मेडिकल सबूत नहीं था और जांच अधिकारी से पूछताछ नहीं हुई थी, इसलिए इसे ‘रेप की कोशिश’ नहीं बल्कि केवल आईपीसी की धारा 354 (महिला की मर्यादा भंग करना) के तहत छेड़छाड़ का अपराध माना जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश: वेबसाइटों पर अपलोड होगी नेशनल रिपोर्ट

हाई कोर्ट्स के इन फैसलों पर लगाम कसने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी समिति (National Judicial Academy Committee) द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट और देश के सभी हाई कोर्ट्स की ऑफिशियल वेबसाइटों पर तुरंत अपलोड किया जाए। शीर्ष अदालत इस मामले में एक विस्तृत और तर्कपूर्ण लिखित फैसला भी जारी करेगी, ताकि भविष्य में कोई भी अदालत यौन अपराधों को हल्के में न ले सके।

news desk

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