नई दिल्ली: अंतरिक्ष से इंटरनेट देने वाली सेवाएं जितनी तेजी से बढ़ रही हैं, उतनी ही तेजी से एक नई चिंता भी सामने आ रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि SpaceX की Starlink सैटेलाइट्स अब लगातार पृथ्वी के वायुमंडल में गिरकर जल रही हैं, और इसका असर धीरे-धीरे पर्यावरण पर दिखने लगा है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, हर दिन औसतन 1–2 सैटेलाइट्स वायुमंडल में री-एंट्री करके जल रही हैं, और आने वाले समय में यह संख्या बढ़कर रोजाना 5 तक पहुंच सकती है। फिलहाल पृथ्वी की निचली कक्षा में 8,000 से ज्यादा स्टारलिंक सैटेलाइट्स मौजूद हैं, और कंपनी का लक्ष्य इन्हें बढ़ाकर 42,000 तक ले जाने का है। इन सैटेलाइट्स की उम्र आमतौर पर 5 से 7 साल होती है, जिसके बाद उन्हें नियंत्रित तरीके से डी-ऑर्बिट किया जाता है, लेकिन हाल के वर्षों में तेज सौर गतिविधि के कारण कई सैटेलाइट्स तय समय से पहले ही गिरने लगी हैं।
वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी चिंता री-एंट्री के दौरान होने वाला प्रदूषण है। सैटेलाइट्स में इस्तेमाल होने वाला एल्यूमिनियम जलने पर एल्यूमिनियम ऑक्साइड के बेहद सूक्ष्म कणों में बदल जाता है, जो वायुमंडल की ऊपरी परतों तक पहुंच सकते हैं। रिसर्च के मुताबिक, ये कण ओजोन लेयर को नुकसान पहुंचाने में उत्प्रेरक की तरह काम कर सकते हैं। 2016 से 2022 के बीच वायुमंडल में एल्यूमिनियम ऑक्साइड की मात्रा में कई गुना वृद्धि दर्ज की गई है।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि भविष्य में अगर मेगा-सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन तेजी से बढ़ते रहे, तो हर साल सैकड़ों टन अतिरिक्त कण वायुमंडल में जमा हो सकते हैं, जिससे लंबे समय में जलवायु और ओजोन दोनों पर असर पड़ सकता है। हालांकि कंपनी का कहना है कि सैटेलाइट्स पूरी तरह जलकर नष्ट हो जाते हैं और जमीन पर खतरा बेहद कम है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इस “नए तरह के अंतरिक्ष प्रदूषण” पर अभी और रिसर्च और अंतरराष्ट्रीय नियमों की जरूरत है।