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फोल्डेबल स्मार्टफोन्स और स्ट्रेचेबल डिस्प्ले को लेकर पिछले कुछ सालों में काफी उत्साह रहा है, लेकिन इन तकनीकों की सबसे बड़ी समस्या हमेशा एक ही रही है—बार-बार मोड़ने या खींचने पर स्क्रीन की ब्राइटनेस कम हो जाती है और बीच में एक स्पष्ट क्रिज (फोल्ड लाइन) बन जाती है। अब दक्षिण कोरिया के वैज्ञानिकों ने इस समस्या का संभावित समाधान खोज लिया है। सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी (SNU) और अमेरिका की ड्रेक्सेल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों की संयुक्त रिसर्च टीम ने एक नया मटेरियल सिस्टम विकसित किया है, जिसकी मदद से ऐसा OLED डिस्प्ले बनाया गया है जो 60% तक स्ट्रेच होने के बाद भी अपनी ब्राइटनेस लगभग बरकरार रखता है। इस महत्वपूर्ण शोध को प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल Nature में प्रकाशित किया गया है।
रिसर्च टीम के अनुसार, पारंपरिक फ्लेक्सिबल OLED डिस्प्ले में जब स्क्रीन को बार-बार मोड़ा या खींचा जाता है तो उसके अंदर मौजूद इलेक्ट्रोड्स और ऑर्गेनिक लेयर्स में माइक्रो-डैमेज होने लगता है। यही डैमेज धीरे-धीरे स्क्रीन पर क्रिज पैदा करता है और लाइट आउटपुट को 20 से 30 प्रतिशत तक कम कर देता है। नए डिजाइन में इस समस्या को हल करने के लिए तीन खास तकनीकी घटकों का इस्तेमाल किया गया है—ExciPh लाइट-एमिटिंग लेयर, MXene-आधारित ट्रांसपेरेंट इलेक्ट्रोड्स और सिल्वर नैनोवायर नेटवर्क।
ExciPh लेयर से बढ़ी लाइट प्रोडक्शन क्षमता
इस OLED का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा ExciPh (ExcipleX-assisted Phosphorescent) लाइट-एमिटिंग लेयर है। यह लेयर इंट्रिन्सिकली स्ट्रेचेबल है, यानी यह बिना टूटे या खराब हुए अपनी मूल लंबाई से 100 प्रतिशत से ज्यादा तक फैल सकती है। तकनीकी रूप से यह लेयर एक्साइटॉन फॉर्मेशन को बेहतर बनाती है, जिससे इलेक्ट्रॉन और होल के संयोजन से ज्यादा कुशलता से प्रकाश उत्पन्न होता है। आसान शब्दों में कहें तो यह लेयर स्क्रीन को खिंचने या मुड़ने पर भी ज्यादा स्थिर और चमकदार बनाए रखने में मदद करती है।
MXene इलेक्ट्रोड और सिल्वर नैनोवायर का कमाल
इस नए OLED डिजाइन में पारंपरिक इलेक्ट्रोड्स की जगह MXene-आधारित ट्रांसपेरेंट इलेक्ट्रोड्स का उपयोग किया गया है। MXene एक उन्नत दो-आयामी मटेरियल है जो उच्च मैकेनिकल मजबूती और ट्यूनेबल वर्क फंक्शन प्रदान करता है। इसका फायदा यह है कि यह इलेक्ट्रॉन और होल इंजेक्शन को अधिक कुशल बनाता है, जिससे डिस्प्ले की ऊर्जा दक्षता बढ़ जाती है। इसके साथ सिल्वर नैनोवायर्स का इस्तेमाल किया गया है, जो स्क्रीन में उच्च ट्रांसपेरेंसी और बेहतर कंडक्टिविटी बनाए रखते हैं। इन तीनों तकनीकों के संयोजन से बना यह OLED बार-बार डिफॉर्मेशन के बाद भी अपनी ब्राइटनेस लगभग स्थिर रखता है।
रिसर्च के परिणाम भी काफी प्रभावशाली रहे हैं। इस डिस्प्ले ने लगभग 17 प्रतिशत की रिकॉर्ड एक्सटर्नल क्वांटम एफिशिएंसी हासिल की, जो स्ट्रेचेबल OLED के लिए काफी उच्च मानी जाती है। खास बात यह है कि कई बार खींचने और मोड़ने के बाद भी इसकी ब्राइटनेस में लगभग कोई गिरावट नहीं देखी गई।
भविष्य के फोल्डेबल और वियरेबल डिवाइस के लिए बड़ा कदम
विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक आने वाले समय में फोल्डेबल स्मार्टफोन्स, वियरेबल डिवाइसेज, इलेक्ट्रॉनिक स्किन, स्मार्ट फैशन डिस्प्ले और यहां तक कि फोल्डेबल लैपटॉप्स के विकास में बड़ी भूमिका निभा सकती है। स्ट्रेचेबल OLED की सबसे बड़ी चुनौती—क्रिज और ब्राइटनेस लॉस—अगर वास्तव में खत्म हो जाती है, तो यह पूरी डिस्प्ले इंडस्ट्री के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकती है।
दिलचस्प बात यह है कि दक्षिण कोरिया की ही KAIST यूनिवर्सिटी की एक अलग रिसर्च टीम ने भी स्ट्रेचेबल OLED टेक्नोलॉजी में प्रगति का दावा किया है। इस टीम ने लिक्विड मेटल इलेक्ट्रोड टेक्नोलॉजी का उपयोग करते हुए ऐसा डिस्प्ले विकसित किया है जो 17,670 cd/m² तक की ब्राइटनेस हासिल कर सकता है और स्ट्रेच होने पर भी इसकी परफॉर्मेंस में कोई खास गिरावट नहीं आती। इस प्रोजेक्ट से जुड़े प्रोफेसर चो हिम-चान के अनुसार, उनकी टीम ने स्ट्रेचेबल डिस्प्ले की परफॉर्मेंस को सीमित करने वाली मूलभूत मटेरियल समस्या को हल करने में सफलता हासिल की है।
OLED इंडस्ट्री को मिल सकता है बड़ा फायदा
यह नई तकनीक दक्षिण कोरिया की OLED इंडस्ट्री के लिए भी बड़ा बूस्ट साबित हो सकती है। दुनिया की दो सबसे बड़ी OLED निर्माता कंपनियां—Samsung Display और LG Display—पहले से ही फोल्डेबल स्क्रीन टेक्नोलॉजी पर काम कर रही हैं। हालांकि फोल्डेबल फोन्स में क्रिज अभी भी उपभोक्ताओं की सबसे बड़ी शिकायतों में से एक है। CES 2026 में Samsung ने एक क्रिज-लेस OLED प्रोटोटाइप जरूर दिखाया था, लेकिन वह पूरी तरह स्ट्रेचेबल नहीं था। नई रिसर्च का दावा है कि यह मटेरियल स्ट्रेचेबल फॉर्म में भी समान प्रदर्शन दे सकता है।
टेक्नोलॉजी विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह रिसर्च प्रोटोटाइप से आगे बढ़कर बड़े पैमाने पर उत्पादन तक पहुंच जाती है, तो 2027 से 2028 के बीच पहली बार ऐसे कमर्शियल डिवाइसेज बाजार में आ सकते हैं जो ज्यादा ड्यूरेबल, ज्यादा ब्राइट और लगभग क्रिज-फ्री होंगे। यह विकास Apple के संभावित फोल्डेबल iPhone सहित अन्य ब्रांड्स के लिए भी चुनौती पैदा कर सकता है, क्योंकि अब तक फोल्डेबल स्क्रीन की सबसे बड़ी कमजोरी—ब्राइटनेस लॉस और क्रिज—कम महत्वपूर्ण समस्या बन सकती है।
सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी और ड्रेक्सेल यूनिवर्सिटी दोनों ही मटेरियल साइंस और डिस्प्ले टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में विश्व स्तर पर अग्रणी संस्थान माने जाते हैं। इस नई रिसर्च को फ्लेक्सिबल इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है, जो आने वाले वर्षों में स्मार्ट डिवाइसेज के डिजाइन और उपयोग के तरीके को पूरी तरह बदल सकता है।
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