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‘123456’ जैसे बैंक नंबर, बंद सेंटर्स और पेंडिंग पेमेंट्स… CAG रिपोर्ट ने खोली स्किल इंडिया में फर्जीवाड़े की पोल

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) को सरकार ने हमेशा देश के युवाओं के लिए रोजगार का सबसे बड़ा रास्ता बताया। दावा किया गया कि इस योजना से युवाओं को हुनर मिलेगा, नौकरी मिलेगी और आत्मनिर्भर भारत की नींव मजबूत होगी। लेकिन नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट नंबर 20 ऑफ 2025 ने इन दावों की पोल खोल दी है। रिपोर्ट में सामने आई गड़बड़ियां यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि यह योजना सच में कौशल विकास के लिए थी या फिर सरकारी फंड को ठिकाने लगाने का एक आसान तरीका बन गई।

फर्जी अकाउंट और डेटा वेरिफिकेशन की भारी चूक

CAG की रिपोर्ट के मुताबिक स्किल इंडिया पोर्टल पर दर्ज 95.90 लाख लाभार्थियों में से 94.53 प्रतिशत बैंक अकाउंट या तो अमान्य थे या पूरी तरह फर्जी। कई अकाउंट नंबर ‘11111111111’, ‘123456’, ‘0000000000’ जैसे थे, जबकि कई जगह सिर्फ ‘N/A’ लिखा गया। इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि बाकी बचे पांच लाख से अधिक लाभार्थियों के लिए सिर्फ 12 हजार यूनिक अकाउंट नंबर इस्तेमाल किए गए, जिन्हें बार-बार दोहराया गया। सवाल उठता है कि इतने बड़े स्तर पर यह फर्जी डेटा कैसे दर्ज हो गया और किसी ने समय रहते इसकी जांच क्यों नहीं की ?

बंद ट्रेनिंग सेंटर और फोटो डुप्लिकेशन का खेल

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि बिहार के बांका, मधेपुरा और शियोहर जैसे जिलों में ऐसे ट्रेनिंग सेंटरों के नाम पर बैच दिखाए गए जो असल में बंद थे। CAG ने 90 सेंटर्स की जांच की, जिनमें से 4 पूरी तरह बंद पाए गए। अब सवाल यह है कि जब सेंटर ही बंद थे, तो वहां ट्रेनिंग कैसे हुई और क्या उन सेंटर्स को फंड भी जारी किया गया?

यही नहीं, आरपीएल यानी रिकग्निशन ऑफ प्रायर लर्निंग में एक ही व्यक्ति की फोटो कई लाभार्थियों के नाम पर इस्तेमाल की गई। बिहार, यूपी, महाराष्ट्र और राजस्थान में ऐसे दर्जनों मामले मिले। क्या यह साफ तौर पर फर्जी सर्टिफिकेट बांटने का मामला नहीं है?

पेमेंट, नियमों की अनदेखी और सरकार की सफाई

पेमेंट और प्लेसमेंट के आंकड़े भी बेहद निराशाजनक हैं। 95.91 लाख प्रमाणित युवाओं में से सिर्फ 17.69 लाख को ही डायरेक्ट बैंक ट्रांसफर के जरिए भुगतान मिला, जबकि 34 लाख से ज्यादा युवाओं को आज तक एक रुपया नहीं मिला। इसके अलावा 6.54 लाख अंडरएज युवाओं और 8.09 लाख न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता से कम लोगों को भी सर्टिफिकेट बांट दिए गए। साफ है कि नियमों को ताक पर रखकर सिर्फ आंकड़े पूरे किए गए।
सरकार की तरफ से कहा गया है कि अब आधार आधारित ई-केवाईसी, फेस ऑथेंटिकेशन और जियो-टैगिंग जैसी व्यवस्थाएं लागू कर दी गई हैं। लेकिन सवाल यह है कि पुराने घोटालों का जवाब कौन देगा? कौन से अधिकारी जिम्मेदार हैं, कितने करोड़ रुपये का गबन हुआ और क्या इस पर कोई एफआईआर दर्ज हुई?

2015 से 2022 के बीच प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना पर करीब 14,450 करोड़ रुपये खर्च किए गए। लेकिन CAG की रिपोर्ट बताती है कि यह योजना युवाओं के भविष्य से ज्यादा सिस्टम की खामियों और लापरवाही की पहचान बन गई है। आखिर में सवाल वही है—जब लाखों युवाओं के नाम पर फर्जीवाड़ा हो, भुगतान न मिले और ट्रेनिंग सिर्फ कागजों में चले, तो सरकार इसे सफलता कैसे कह सकती है? देश के युवा अब भी इंतजार कर रहे हैं कि सरकार इन सवालों का जवाब कब देगी।

news desk

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