बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने भारत में रहकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। उन्होंने साफ किया है कि देश से बाहर होने का मतलब यह नहीं कि वह निष्क्रिय हैं, बल्कि वह हर स्तर पर—खासकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर—लगातार सक्रिय हैं और “सही समय” का इंतजार कर रही हैं।
2024 के छात्र आंदोलन के बाद सत्ता से हटने और देश छोड़ने को मजबूर हुईं हसीना ने संकेत दिए हैं कि उनकी वापसी तय है, लेकिन इसके लिए बांग्लादेश में हालात बदलने जरूरी हैं। उनके मुताबिक जब तक देश में लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून का राज बहाल नहीं होता, तब तक वापसी का कोई मतलब नहीं।
अपनी पार्टी अवामी लीग पर लगे प्रतिबंध को लेकर हसीना ने कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि जनता की आवाज है, जिसे किसी सरकारी आदेश से खत्म नहीं किया जा सकता।
उन्होंने यह भी याद दिलाया कि अगर ऐसे ही प्रतिबंधों से आंदोलन खत्म होते, तो बांग्लादेश का अस्तित्व ही नहीं बनता। हसीना का दावा है कि आज भी लाखों समर्थक और हजारों कार्यकर्ता पार्टी के साथ मजबूती से खड़े हैं।
हसीना ने अंतरिम सरकार के प्रमुख मुहम्मद यूनुस पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उनके शासन में अवामी लीग के खिलाफ “राजनीतिक नरसंहार” जैसा माहौल बनाया गया है।
उनके अनुसार सैकड़ों नेताओं और कार्यकर्ताओं की हत्या हुई और लाखों लोगों को झूठे मामलों में फंसाकर गिरफ्तार किया गया। उन्होंने इसे सुनियोजित दमन बताते हुए कहा कि डर और दबाव के जरिए विपक्ष को खत्म करने की कोशिश की जा रही है।
हसीना ने अपने कार्यकाल को विकास का दौर बताते हुए पद्मा ब्रिज, रूपपुर परमाणु परियोजना और मातारबाड़ी पोर्ट जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स का जिक्र किया। उनका आरोप है कि मौजूदा सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था को संकट में डाल दिया है और विकास की रफ्तार थम गई है।
भारत-बांग्लादेश संबंधों को लेकर हसीना ने कहा कि यह रिश्ता सिर्फ पड़ोसी देशों का नहीं, बल्कि ऐतिहासिक साझेदारी का है। उन्होंने याद दिलाया कि बांग्लादेश की आजादी में भारत की भूमिका अहम रही है।
हालांकि उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बांग्लादेश में कुछ राजनीतिक और कट्टरपंथी ताकतें लंबे समय से भारत विरोधी माहौल बनाकर राजनीति करती रही हैं, और मौजूदा सरकार भी उसी राह पर चल रही है।
इस पूरे इंटरव्यू में शेख हसीना का सबसे बड़ा संदेश यही है—वह राजनीति से बाहर नहीं हुई हैं।
उनकी रणनीति अब सीधी टकराव की बजाय “इंतजार और अंतरराष्ट्रीय दबाव” की दिख रही है। साफ है कि बांग्लादेश की राजनीति में उनकी वापसी सिर्फ समय का सवाल है, लेकिन वह इसे लोकतांत्रिक बहाली से जोड़कर बड़ा नैरेटिव बनाने की कोशिश कर रही हैं।
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