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Sardar Vallabhbhai Patel Jayanti: कैसे एक शख्स ने बंटे हुए भारत को एक सूत्र में पिरोया? जानिए ‘Iron Man of India’ की पूरी कहानी

भारत के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनकी पहचान सिर्फ उनके पद या राजनीतिक ताकत से नहीं, बल्कि उनके फैसलों से बनती है। आजादी के बाद भारत के सामने एक ऐसी चुनौती खड़ी थी, जो नवगठित देश के अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बन सकती थी। देश में 500 से अधिक रियासतें थीं और हर रियासत का अपना शासक और अलग भविष्य था। ऐसे मुश्किल दौर में एक शख्स ने अपनी कूटनीति, दृढ़ इच्छाशक्ति और नेतृत्व क्षमता से भारत को बिखरने से बचाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। यह शख्स थे सरदार वल्लभभाई पटेल, जिन्हें आज पूरा देश Iron man of India के नाम से याद करता है। आज यानि 31 अक्टूबर 2026 को उनकी 151वीं जयंती पर देश उन्हें नमन कर रहा है। देशभर में इस अवसर को राष्ट्रीय एकता दिवस (Rashtriya Ekta Diwas) के रूप में मनाया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह समेत कई नेताओं ने सरदार पटेल को श्रद्धांजलि अर्पित कर उनके योगदान को याद किया।

कौन थे सरदार वल्लभभाई पटेल?

सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नाडियाड में हुआ था। उनके पिता का नाम झवेरभाई पटेल और माता का नाम लाडबा देवी था। पेशे से वकील रहे पटेल ने इंग्लैंड के मिडिल टेंपल से कानून की पढ़ाई की और 1913 में बैरिस्टर बनकर भारत लौटे।

शुरुआत में उन्होंने अहमदाबाद में वकालत की, लेकिन महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए। धीरे-धीरे वह कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए और अपनी संगठन क्षमता के दम पर राष्ट्रीय राजनीति में अलग पहचान बनाई।  उन्हें लौह पुरुष की उपाधि उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति, साहस और मजबूत नेतृत्व के कारण मिली।

खेड़ा से बारडोली तक, किसानों के संघर्ष ने बनाया ‘सरदार‘

सरदार पटेल की नेतृत्व क्षमता का पहला बड़ा उदाहरण 1918 के खेड़ा सत्याग्रह में देखने को मिला। गुजरात के खेड़ा जिले में फसल खराब होने के बावजूद किसानों से लगान वसूला जा रहा था। पटेल ने महात्मा गांधी के साथ मिलकर किसानों को संगठित किया और लगान में राहत की मांग को लेकर आंदोलन का नेतृत्व किया।

इसके बाद 1928 में उन्होंने गुजरात के बारडोली में किसानों के आंदोलन का नेतृत्व किया। अंग्रेजी हुकूमत ने किसानों पर लगान बढ़ा दिया था, जबकि किसान पहले से ही आर्थिक परेशानियों का सामना कर रहे थे। पटेल ने किसानों को एकजुट कर इस फैसले का विरोध किया।

आंदोलन की सफलता के बाद बारडोली के किसानों ने उन्हें ‘सरदार’ की उपाधि दी। इसके बाद वह पूरे देश में सरदार वल्लभभाई पटेल के नाम से प्रसिद्ध हो गए।

आजादी की लड़ाई में क्या रही भूमिका?

सरदार पटेल ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। उन्होंने असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की।

– 1918: खेड़ा सत्याग्रह में किसानों का नेतृत्व किया।

– 1920: असहयोग आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।

– 1928: बारडोली सत्याग्रह का नेतृत्व किया।

– 1931: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कराची अधिवेशन की अध्यक्षता की।

– 1942: भारत छोड़ो आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पटेल ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कई बार जेल की सजा भी काटी। वह महात्मा गांधी के करीबी सहयोगियों में शामिल थे और कांग्रेस संगठन को मजबूत बनाने में उनकी अहम भूमिका रही।

562 रियासतों को भारत में मिलाकर कैसे बनाया अखंड राष्ट्र?

सरदार पटेल की सबसे बड़ी उपलब्धियों में आजादी के बाद देशी रियासतों का भारत में एकीकरण शामिल है। 15 अगस्त 1947 को जब भारत स्वतंत्र हुआ, उस समय देश के सामने राजनीतिक एकीकरण की बड़ी चुनौती थी। अलग-अलग रियासतों के शासकों के सामने भारत या पाकिस्तान में शामिल होने अथवा स्वतंत्र रहने के विकल्प थे।

ऐसे समय में सरदार पटेल ने तत्कालीन सचिव वी.पी. मेनन के साथ मिलकर कूटनीति, बातचीत और दृढ़ निर्णयों के जरिए रियासतों को भारतीय संघ में शामिल करने का अभियान चलाया। सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक, इस प्रक्रिया में 560 से अधिक रियासतों को भारत में शामिल किया गया। कई ऐतिहासिक विवरणों में इनकी संख्या 562 बताई गई है।

स्वतंत्र भारत के पहले उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री बने

15 अगस्त 1947 को देश की आजादी के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल को स्वतंत्र भारत का पहला उपप्रधानमंत्री और पहला गृह मंत्री बनाया गया। इसके साथ ही उन्होंने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी भी संभाली।

उनके सामने विभाजन के बाद बिगड़ी कानून-व्यवस्था, सांप्रदायिक तनाव और शरणार्थियों के पुनर्वास जैसी बड़ी चुनौतियां थीं। उन्होंने इन समस्याओं से निपटने के लिए प्रशासनिक स्तर पर महत्वपूर्ण फैसले लिए।

स्टैच्यू ऑफ यूनिटी: दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा से जुड़ी विरासत

सरदार पटेल के सम्मान में गुजरात के नर्मदा जिले में स्टैच्यू ऑफ यूनिटी का निर्माण किया गया। यह प्रतिमा 182 मीटर ऊंची है और दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा के रूप में प्रसिद्ध है। इसका उद्घाटन 31 अक्टूबर 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरदार पटेल की जयंती के अवसर पर किया था। यह प्रतिमा केवल एक स्मारक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और अखंडता के उनके विचारों का प्रतीक है।

सरदार वल्लभभाई पटेल का निधन 15 दिसंबर 1950 को मुंबई में हुआ था, लेकिन देश के लिए उनके अतुलनीय योगदान को देखते हुए वर्ष 1991 में उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। उनका जीवन केवल स्वतंत्रता आंदोलन की कहानी नहीं, बल्कि एक मजबूत और एकजुट भारत के निर्माण की मिसाल है।

किसानों के अधिकारों के लिए संघर्ष से लेकर सैकड़ों रियासतों के एकीकरण और देश की प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने तक, उनका योगदान भारतीय इतिहास में हमेशा याद किया जाएगा। आज उनकी 151वीं जयंती पर देश उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ राष्ट्रीय एकता और अखंडता के उनके संदेश को भी याद कर रहा है।

news desk

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