डॉलर के सामने रुपया ‘ऑल-टाइम लो’ पर
भारतीय रुपये ने शुक्रवार को ऐसा गोता लगाया कि करेंसी बाजार पूरी तरह हिल गया. डॉलर के मुकाबले रुपया 89.49 के सर्वकालिक निचले स्तर पर पहुँच गया, जो पिछले दिन के मुकाबले पूरे 79 पैसे की गिरावट थी. मई 2025 के बाद यह सबसे बड़ा एक-दिवसीय नुकसान रहा. सोमवार को थोड़ी सी रिकवरी दिखी और रुपया 89.25 पर ट्रेड करने लगा, लेकिन मार्केट में टेंशन अभी भी बनी हुई है. दिलचस्प बात यह है कि दुनिया भर से कोई बड़ा निगेटिव संकेत नहीं था—डॉलर इंडेक्स बस 0.04% ऊपर, क्रूड ऑयल 62 डॉलर पर आराम से बैठा और बाकी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की करेंसी भी नॉर्मल थीं. यानी साफ है कि गिरावट की सबसे बड़ी वजह घर के अंदर की दिक्कतें हैं—डॉलर की अचानक बढ़ी मांग और मार्केट में कम सप्लाई.
2025 में अब तक रुपया करीब 4.5% कमजोर हो चुका है, जो एशिया की बड़ी करेंसीज़ में सबसे खराब परफॉर्मेंस है. वजह भी साफ है—अक्टूबर में भारत का ट्रेड डेफिसिट 41.68 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया. सोने के आयात में 199% की छलांग ने अकेले ही बिल में 9.8 अरब डॉलर की बढ़ोतरी कर दी. ऊपर से निर्यात 12% तक घट गया. अमेरिका द्वारा 50% टैरिफ लगाने से इंजीनियरिंग और ज्वेलरी सेक्टर का हाल और खराब हो गया.
उधर, FII ने 2025 में अब तक 16.5 अरब डॉलर की बिकवाली कर डाली, जिससे मार्केट में डॉलर की डिमांड और बढ़ती गई. फेड की हॉकिश बातें और भारत-US ट्रेड डील में देरी ने भी रुपये पर दबाव बढ़ाया. आरबीआई ने साफ कहा कि वे किसी “स्पेसिफिक लेवल” को नहीं बचा रहे, लेकिन ट्रेडर्स का कहना है कि 88.80 पर सपोर्ट हटते ही स्टॉप-लॉस ट्रिगर हुए और गिरावट तेज हो गई.
शुक्रवार को जब रुपया 89.50 के पार जाने लगा, तो आरबीआई ने डॉलर बेचकर गिरावट को रोकने की कोशिश की. इसका असर दिखा और सोमवार को थोड़ा उछाल मिला. अभी मार्केट में 89.50 को “नया कड़ा रेजिस्टेंस” माना जा रहा है.
एक्सपर्ट्स कह रहे हैं कि अगर भारत-अमेरिका ट्रेड डील दिसंबर तक फाइनल हो जाती है, तो रुपये में दमदार रिकवरी आ सकती है. लेकिन इकोनॉमिस्ट्स चेतावनी दे रहे हैं कि FY26 में BoP घाटा 5 अरब डॉलर तक जा सकता है—जो 1991 के बाद पहली बार होगा.
विपक्ष ने सरकार को घेरा
कांग्रेस लीडर जयराम रमेश ने नरेन्द्र मोदी के पुराने बयानों का वीडियो शेयर करते हुए (जिसमें उन्होंने रूपए के गिरने का जिम्मेदार तत्कालीन कांग्रेस सरकार को ठहराया था.) लिखा कि –
“डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार गिरावट में है. यह अब 90 रुपये प्रति डॉलर के स्तर को छूने वाला है.
क्या प्रधानमंत्री को याद है कि जुलाई 2013 में उन्होंने खुद क्या कहा था?”
कमजोर रुपया IT, फार्मा और मेटल सेक्टर जैसे एक्सपोर्टर्स के लिए फायदेमंद साबित होगा, जबकि तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और सोने जैसे आयातकों पर दबाव बढ़ेगा. महंगाई पर भी असर दिख सकता है.
FII की बिकवाली से सेंसेक्स-निफ्टी 1–2% फिसले, लेकिन मिडकैप्स में वैल्यूएशन कूलिंग के बाद खरीदारी के मौके बन सकते हैं.अगले कुछ हफ्तों में रुपये का रेंज 88.80 से 90.00 के बीच रह सकता है. अगर ट्रेड डील लटक गई, तो यह 90.40–91 तक भी जा सकता है.
फिलहाल यह स्थिति कोई “फाइनेंशियल इमरजेंसी” नहीं है, लेकिन एक सख्त चेतावनी जरूर है—भारत को निर्यात बढ़ाना होगा, निवेश आकर्षित करना होगा और करेंसी को स्टेबल बनाना होगा। मार्केट की उम्मीद है कि यह तूफान जल्द थमेगा.
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