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राज्यसभा चुनाव 2026: ओडिशा से बिहार तक क्रॉस वोटिंग का खेल, मुस्लिम विधायकों ने भी दिया झटका !

16 मार्च 2026 के राज्यसभा चुनावों ने सिर्फ राजनीतिक समीकरण नहीं बदले, बल्कि कांग्रेस पार्टी के भीतर चल रही खामोश हलचलों को भी उजागर कर दिया। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह रही कि जिन इलाकों में कांग्रेस अपने पारंपरिक वोट बैंक—खासकर मुस्लिम समर्थन—को मजबूत मानती रही है, वहीं से क्रॉस वोटिंग और अनुपस्थिति की खबरों ने पार्टी को अंदर तक झकझोर दिया। बिहार, ओडिशा और हरियाणा—तीनों राज्यों की तस्वीर यह बताती है कि कहानी सिर्फ चुनावी नतीजों की नहीं, बल्कि अंदरूनी खींचतान और राजनीतिक “मैनेजमेंट” की भी है।

बिहार: गायब विधायक और बिगड़ा पूरा गणित

बिहार में महागठबंधन की हार ने सबसे पहले सवाल खड़े किए। कांग्रेस के तीन विधायक—मनोज विश्वास, सुरेंद्र कुशवाहा और मनोहर प्रसाद—वोटिंग के समय गायब हो गए। उनके साथ आरजेडी के मुस्लिम विधायक फैसल रहमान की अनुपस्थिति ने भी समीकरण बिगाड़ दिया। यही वे वोट थे, जिन पर विपक्ष अपनी जीत का भरोसा कर रहा था। इन विधायकों का अचानक संपर्क से बाहर हो जाना सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि राजनीतिक दबाव या रणनीतिक “मैनेजमेंट” की ओर इशारा करता है।

राज्यसभा चुनाव 2026

ओडिशा में मामला और भी ज्यादा संवेदनशील हो गया, जहां कांग्रेस की मुस्लिम विधायक सोफिया फिरदौस ने पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार दिलीप रे को वोट दिया। उनके साथ दासरथी गोमांगो और रमेश जेना ने भी क्रॉस वोटिंग की। यह घटनाक्रम इसलिए अहम है क्योंकि इसे कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक में दरार के रूप में देखा जा रहा है।

ओडिशा: मुस्लिम विधायक पर आरोप और खुली क्रॉस वोटिंग

यहां सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, बल्कि बीजेडी के कई विधायकों पर भी क्रॉस वोटिंग के आरोप लगे, जिससे पूरा चुनावी गणित बदल गया। विपक्ष की संयुक्त रणनीति पूरी तरह फेल हो गई और बीजेपी खेमे को सीधा फायदा मिला। यह घटना बताती है कि सिर्फ गठबंधन बनाना काफी नहीं, उसे जमीन पर एकजुट रखना भी उतना ही जरूरी है।

हरियाणा में कांग्रेस ने पहले से खतरा भांपते हुए अपने विधायकों को रिसॉर्ट में शिफ्ट किया, लेकिन इसके बावजूद 5 विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की। हालांकि यहां पार्टी अपनी सीट बचाने में सफल रही, लेकिन अंदरखाने यह साफ हो गया कि संगठन में भरोसे का संकट गहरा चुका है।

हरियाणा: रिसॉर्ट पॉलिटिक्स के बावजूद सेंध

हरियाणा के नतीजों पर कांग्रेस नेता भूपिंदर हुड्डा ने X पर पोस्ट करते हुए इसे “प्रजातंत्र की जीत और वोट चोरी की हार” बताया। उन्होंने कहा कि तीसरा उम्मीदवार खड़ा कर बीजेपी ने वोट चोरी का प्रयास किया, लेकिन कांग्रेस विधायकों ने उसे असफल कर दिया और यह जनता के विश्वास की जीत है।

वहीं दीपक हुड्डा ने आरोप लगाया कि “हमारे 4 सही वोटों को नाजायज तरीके से कैंसिल कराया गया” और इसे खरीद-फरोख्त व लोकतंत्र के “चीर हरण” का प्रयास बताया। उनके अनुसार, पूरी रात संघर्ष के बाद कांग्रेस ने यह लड़ाई जीती, लेकिन देश के भविष्य को लेकर चिंता बनी हुई है।

इन घटनाओं को जोड़कर देखें तो साफ है कि जहां बिहार और ओडिशा में कांग्रेस “पकड़ी गई”, वहीं हरियाणा में वह किसी तरह “बच गई”। लेकिन बड़ा सवाल इससे आगे जाता है—क्या यह सिर्फ कांग्रेस की आंतरिक कमजोरी है, या बीजेपी की रणनीतिक बढ़त?

विपक्ष लगातार आरोप लगा रहा है कि बीजेपी “साम, दाम, दंड, भेद” की नीति पर काम कर रही है—चाहे वह विधायकों को प्रभावित करना हो, वोटों की खरीद-फरोख्त के आरोप हों या सामाजिक-राजनीतिक ध्रुवीकरण के जरिए माहौल बनाना। बीजेपी इन आरोपों को खारिज कर इसे विपक्ष की कमजोरी बताती है, लेकिन यह भी सच है कि आज की राजनीति में “मैनेजमेंट” और “नैरेटिव” निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं।

बड़ा सवाल: किस तरफ जा रहा है कांग्रेस का भविष्य ?

कांग्रेस के सामने अब असली चुनौती यही है कि वह इस आक्रामक राजनीति का मुकाबला कैसे करे। सिर्फ आरोप लगाने से बात नहीं बनेगी—उसे अपने संगठन को मजबूत करना होगा, विधायकों में अनुशासन लाना होगा और एक स्पष्ट रणनीति के साथ आगे बढ़ना होगा।

अंततः यह लड़ाई सिर्फ एक चुनाव की नहीं, बल्कि राजनीतिक भविष्य की है। अगर कांग्रेस समय रहते नहीं संभली, तो क्रॉस वोटिंग की ये घटनाएं आने वाले चुनावों में और बड़ी गिरावट का संकेत बन सकती हैं। वहीं बीजेपी यह संदेश देने में सफल हो रही है कि वह जीत के लिए हर स्तर पर तैयार है—और यही आज की सियासत का सबसे बड़ा सच बनता जा रहा है।

Gopal Singh

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