नई दिल्ली। भारतीय राजनीति में चाय की मेज पर होने वाली मुलाकातें कभी-कभी बड़े सियासी संदेश देती हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी मंगलवार को विपक्षी सांसदों और सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों के साथ हाई-टी बैठक करने जा रहे हैं।
इस बैठक के बीच 1999 का वह चर्चित राजनीतिक घटनाक्रम भी याद किया जा रहा है, जब एक चाय पार्टी में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और एआईएडीएमके प्रमुख जे जयललिता की मुलाकात हुई थी। इसके कुछ ही दिनों बाद अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार लोकसभा में विश्वास मत हार गई थी।
हालांकि, वाजपेयी सरकार के गिरने की वजह केवल वह चाय पार्टी नहीं थी। इसके पीछे गठबंधन में लंबे समय से चल रहा टकराव, जयललिता की मांगें और समर्थन वापस लेने का फैसला था। लेकिन सुब्रमण्यम स्वामी के घर हुई उस मुलाकात ने भारतीय राजनीति में एक दिलचस्प अध्याय जरूर जोड़ दिया।
मंगलवार को राहुल गांधी अपने आवास पर विपक्षी नेताओं और सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों के साथ हाई-टी आयोजित कर रहे हैं। यह बैठक मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष के विरोध और आगे की रणनीति को लेकर हो रही है।
ऐसे में 1999 की चाय पार्टी का जिक्र इसलिए अहम हो जाता है, क्योंकि उस समय भी विपक्षी खेमे में राजनीतिक विकल्पों और सरकार के भविष्य को लेकर हलचल तेज थी। हालांकि, दोनों बैठकों के मुद्दे और राजनीतिक परिस्थितियां अलग-अलग हैं।
राहुल गांधी की बैठक का नतीजा क्या होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। लेकिन 1999 की घटना बताती है कि गठबंधन की राजनीति में छोटी-सी मुलाकात भी बड़े राजनीतिक घटनाक्रम का हिस्सा बन सकती है।
इस कहानी की शुरुआत 1998 के लोकसभा चुनाव के बाद बने राजनीतिक समीकरणों से होती है। उस चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए सरकार बनी। इस सरकार को एआईएडीएमके समेत कई सहयोगी दलों का समर्थन हासिल था।
लेकिन गठबंधन के भीतर मतभेद लगातार बढ़ रहे थे। तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जे जयललिता और बीजेपी नेतृत्व के बीच कई मुद्दों पर टकराव था। जयललिता चाहती थीं कि केंद्र सरकार उनकी मांगों पर ध्यान दे, जबकि बीजेपी के लिए सहयोगी दलों की मांगों और गठबंधन के दूसरे घटकों के बीच संतुलन बनाना चुनौती बन रहा था।
इसी राजनीतिक माहौल में जनता पार्टी के तत्कालीन नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने 29 मार्च 1999 को चाय पार्टी आयोजित की। इस बैठक में सोनिया गांधी और जयललिता की मुलाकात हुई। दोनों नेताओं के बीच बातचीत को वाजपेयी सरकार के खिलाफ संभावित राजनीतिक विकल्पों की चर्चा से जोड़कर देखा गया।
उस समय कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बाहर थी और वाजपेयी सरकार को हटाने के लिए विपक्षी दलों के बीच समर्थन जुटाने की कोशिशें चल रही थीं। जयललिता के पास सरकार के बहुमत को प्रभावित करने की क्षमता थी, क्योंकि उनकी पार्टी के सांसद एनडीए सरकार के लिए महत्वपूर्ण थे।
चाय पार्टी के बाद भी बीजेपी और एआईएडीएमके के बीच मतभेद खत्म नहीं हुए। जयललिता की मांगों में तमिलनाडु की तत्कालीन डीएमके सरकार को बर्खास्त करने का मुद्दा भी शामिल था। इसके अलावा केंद्र सरकार के साथ उनके कई राजनीतिक और प्रशासनिक मतभेद थे।
वाजपेयी सरकार उनकी सभी मांगों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी। इससे गठबंधन में तनाव बढ़ता गया और आखिरकार अप्रैल 1999 में जयललिता ने एनडीए सरकार से समर्थन वापस ले लिया।
इस फैसले ने सरकार के बहुमत पर संकट खड़ा कर दिया। राष्ट्रपति केआर नारायणन ने वाजपेयी सरकार को लोकसभा में विश्वास मत हासिल करने के लिए कहा। इसके बाद पूरा देश संसद में होने वाले मतदान के नतीजे का इंतजार करने लगा।
17 अप्रैल 1999 को लोकसभा में विश्वास मत पर मतदान हुआ। यह भारतीय संसदीय इतिहास के सबसे नाटकीय राजनीतिक मुकाबलों में शामिल हो गया।
वाजपेयी सरकार के पक्ष में 269 वोट पड़े, जबकि विरोध में 270 सांसदों ने मतदान किया। इस तरह सरकार महज एक वोट से विश्वास मत हार गई और अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।
इस घटनाक्रम में ओडिशा के तत्कालीन मुख्यमंत्री गिरिधर गमांग का वोट भी बेहद चर्चित रहा। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया था और सांसद के तौर पर विश्वास मत में हिस्सा लिया। उन्होंने सरकार के खिलाफ मतदान किया।
एक वोट के अंतर से मिली हार ने दिखा दिया कि गठबंधन सरकार में प्रत्येक सांसद का समर्थन कितना महत्वपूर्ण हो सकता है। इसके बाद देश मध्यावधि लोकसभा चुनाव की ओर बढ़ गया।
वाजपेयी सरकार गिरने के बाद 1999 में लोकसभा चुनाव हुए। इससे पहले भारत और पाकिस्तान के बीच कारगिल युद्ध भी हो चुका था। राष्ट्रीय सुरक्षा, नेतृत्व और स्थिर सरकार जैसे मुद्दे चुनावी बहस के केंद्र में रहे।
इस बार बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए ने बहुमत हासिल किया। 13 अक्टूबर 1999 को अटल बिहारी वाजपेयी ने तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। उनकी यह सरकार अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा करने में सफल रही।
इस तरह 1999 की राजनीति में पहले समर्थन वापसी, फिर एक वोट से सरकार गिरने और उसके बाद दोबारा सत्ता में वापसी का पूरा घटनाक्रम देखने को मिला।
राहुल गांधी की मौजूदा हाई-टी बैठक को लेकर भी राजनीतिक हलकों में उत्सुकता है। इसमें विपक्षी सांसदों और सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों के शामिल होने की संभावना है। बैठक का मुख्य मुद्दा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष की रणनीति बताया जा रहा है।
हालांकि, 1999 की चाय पार्टी और आज की बैठक के बीच सीधा राजनीतिक समानांतर खींचना जल्दबाजी होगी। उस समय सरकार के बहुमत पर संकट था, जबकि मौजूदा बैठक का संदर्भ अलग है।
फिर भी इतिहास का यह किस्सा याद दिलाता है कि राजनीति में बातचीत, गठबंधन और समर्थन के समीकरण बेहद अहम होते हैं। सुब्रमण्यम स्वामी के घर हुई चाय पार्टी के बाद की घटनाओं ने भारतीय राजनीति में एक ऐसा अध्याय लिखा, जिसकी चर्चा आज भी होती है। अब देखना होगा कि राहुल गांधी की हाई-टी बैठक से विपक्ष की आगे की रणनीति को क्या दिशा मिलती है।
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