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पंजाब चुनाव 2026: AAP, कांग्रेस, भाजपा या अकाली दल… किसकी होगी सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा? इन चुनौतियों पर टिकी सियासी बाजी

नई दिल्ली: पंजाब विधानसभा चुनाव में अब करीब सात महीने का समय बचा है और राज्य की राजनीति पूरी तरह चुनावी मोड में पहुंच चुकी है। सत्ता में काबिज आम आदमी पार्टी, वापसी की उम्मीद लगाए कांग्रेस, नए समीकरण तलाश रही भाजपा और अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा शिरोमणि अकाली दल—चारों दलों के सामने अलग-अलग चुनौतियां खड़ी हैं। ऐसे में इस बार का चुनाव सिर्फ सरकार बनाने की लड़ाई नहीं, बल्कि सभी प्रमुख दलों के लिए राजनीतिक परीक्षा भी माना जा रहा है।

सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी विपक्ष की बिखरी स्थिति का फायदा उठाकर लगातार दूसरी बार सरकार बनाने की उम्मीद कर रही है। मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व वाली सरकार अपने कार्यों के आधार पर जनता का समर्थन मिलने का दावा कर रही है। दूसरी ओर कांग्रेस का मानना है कि सरकार के खिलाफ बन रहे माहौल का लाभ उसे मिल सकता है, हालांकि पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी उसकी राह मुश्किल बना रही है।

शिरोमणि अकाली दल लंबे समय से कमजोर राजनीतिक दौर से गुजर रहा है और संगठन को फिर से मजबूत करने की कोशिशों में जुटा है। वहीं भाजपा सीमित जनाधार के बावजूद पंजाब में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए लगातार रणनीति बना रही है।

भगवंत मान से जुड़े विवाद पर कांग्रेस की नजर

मुख्यमंत्री भगवंत मान से जुड़े कथित बेअदबी वीडियो विवाद को कांग्रेस चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में है। 15 जून को सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था ने कथित वीडियो को लेकर मान को “गुरु विरोधी” और “खालसा पंथ विरोधी” घोषित किया था। हालांकि मुख्यमंत्री लगातार यह कहते रहे हैं कि वीडियो में दिखाई देने वाला व्यक्ति वह नहीं हैं और यह उन्हें बदनाम करने की साजिश है।

हाल के महीनों में आम आदमी पार्टी को दल-बदल का भी सामना करना पड़ा। अप्रैल में पार्टी के 10 राज्यसभा सदस्यों में से सात ने पाला बदलकर भाजपा का दामन थाम लिया। इनमें छह सदस्य पंजाब से चुने गए थे।

हालांकि इन झटकों के बावजूद पार्टी ने मई में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करते हुए आठ में से पांच नगर निगम, 75 में से 39 नगर परिषद और 20 में से नौ नगर पंचायतों में बहुमत हासिल किया।

कांग्रेस की राह में सबसे बड़ी चुनौती गुटबाजी

कांग्रेस सरकार विरोधी माहौल का लाभ उठाने की कोशिश कर रही है, लेकिन पार्टी के भीतर बढ़ते मतभेद उसके लिए बड़ी परेशानी बने हुए हैं। हाल ही में पार्टी नेतृत्व ने संगठन में संतुलन बनाने की कोशिश करते हुए राज्य अध्यक्ष और विधानसभा में विपक्ष के नेता को बरकरार रखा, जबकि पूर्व मुख्यमंत्री को चुनाव प्रचार समिति की जिम्मेदारी सौंपी।

इसके बावजूद पार्टी के भीतर खींचतान कम नहीं हुई। कई नेताओं और समर्थकों के बीच मतभेद खुलकर सामने आए हैं। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि आने वाले समय में कांग्रेस के कुछ नेता भाजपा का रुख कर सकते हैं, जिससे पार्टी की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।

भाजपा नए समीकरण बनाने में जुटी

भाजपा पंजाब में अपने राजनीतिक विस्तार के लिए विरोधी दलों के बीच मौजूद मतभेदों का फायदा उठाने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी लगातार राज्य सरकार पर बाढ़ प्रबंधन, रुकी विकास परियोजनाओं और बढ़ते कर्ज जैसे मुद्दों को लेकर हमला बोल रही है।

सूत्रों के अनुसार भाजपा अपने पूर्व सहयोगी शिरोमणि अकाली दल के साथ संभावित गठबंधन को लेकर भी अनौपचारिक बातचीत कर रही है। वहीं केंद्र सरकार के कुछ संभावित फैसलों के जरिए भी राज्य में सकारात्मक संदेश देने की रणनीति बनाई जा रही है।

पार्टी नेताओं का मानना है कि सिख कैदियों की रिहाई जैसे मुद्दों पर पहल और अग्निवीरों से जुड़े प्रावधानों में बदलाव जनता के बीच भाजपा की स्वीकार्यता बढ़ा सकते हैं। साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनावी चेहरा बनाकर हिंदू बहुल इलाकों में राजनीतिक बढ़त हासिल करने की भी तैयारी की जा रही है।

अकाली दल के सामने अस्तित्व बचाने की चुनौती

शिरोमणि अकाली दल लगातार कमजोर होती राजनीतिक पकड़ को दोबारा मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। पार्टी नेतृत्व संगठन को सक्रिय करने और पारंपरिक वोट बैंक को वापस जोड़ने की रणनीति पर काम कर रहा है, लेकिन मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में उसके सामने चुनौती आसान नहीं मानी जा रही।

पंजाब किन गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है?

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी का कहना है कि पंजाब आज अपने पुनर्गठन के समय की तुलना में कहीं अधिक गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। उनके अनुसार राज्य पर सार्वजनिक ऋण लगातार बढ़ा है, औसत भूमि जोत का आकार घटा है, भूजल स्तर तेजी से नीचे गया है और उद्योग व रोजगार की कमी बड़ी चिंता बन चुकी है। इसके साथ ही नशे और उससे जुड़े अपराधों को भी उन्होंने गंभीर चुनौती बताया।

उन्होंने कहा कि बढ़ते कर्ज के बीच आम आदमी पार्टी लोकलुभावन योजनाओं पर जोर दे रही है, कांग्रेस आंतरिक कलह में उलझी है, शिरोमणि अकाली दल अपनी खोई जमीन वापस पाने के लिए संघर्ष कर रहा है और भाजपा अभी भी सीमित राजनीतिक दायरे में है। ऐसे में पंजाब की राजनीति अनिश्चित दौर से गुजर रही है।

तिवारी का कहना है कि राज्य को मौजूदा संकट से बाहर निकालने के लिए राजनीतिक दलों के बीच व्यापक सहमति या फिर ऐसी सरकार की जरूरत है, जो दीर्घकालिक सुधारों के लिए कठिन फैसले लेने का साहस दिखा सके।

vineet verma

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