नई दिल्ली: सिंधु जल समझौते को स्थगित किए जाने के एक वर्ष बाद भारत ने जल संसाधनों के रणनीतिक उपयोग की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। केंद्र सरकार सिंधु बेसिन की नदियों के पानी का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करने के लिए दो महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर तेजी से काम आगे बढ़ा रही है। इन योजनाओं का उद्देश्य देश के भीतर जल प्रबंधन क्षमता को मजबूत करना और उपलब्ध जल संसाधनों का अधिक प्रभावी इस्तेमाल करना है।
सरकार का मानना है कि इन परियोजनाओं के पूरा होने के बाद जल संरक्षण, सिंचाई और ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में दीर्घकालिक लाभ मिलेंगे। हालांकि दोनों योजनाएं बड़े पैमाने की हैं और इन्हें पूरा होने में कई वर्ष लग सकते हैं।
सिंधु जल समझौते के तहत सिंधु बेसिन की छह प्रमुख नदियों के जल उपयोग को भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजित किया गया था। समझौते के अनुसार सिंधु, झेलम और चिनाब नदियों के अधिकांश जल उपयोग का अधिकार पाकिस्तान को दिया गया था, जबकि रावी, ब्यास और सतलुज नदियों पर भारत का प्रमुख अधिकार तय किया गया था।
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अपने हिस्से के जल संसाधनों के अधिकतम उपयोग पर विशेष जोर देना शुरू किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्वी नदियों पर आवश्यक बुनियादी ढांचा पहले से मौजूद है, लेकिन पश्चिमी नदियों के जल के बेहतर उपयोग के लिए नई परियोजनाओं की जरूरत महसूस की जा रही थी।
सरकार की सबसे महत्वपूर्ण योजनाओं में चिनाब-ब्यास लिंक परियोजना शामिल है, जिसकी अनुमानित लागत 2,352 करोड़ रुपये बताई जा रही है। इस परियोजना के तहत करीब 8.7 किलोमीटर लंबी सुरंग का निर्माण प्रस्तावित है।
योजना के पहले चरण में लाहौल घाटी में चंद्रा नदी पर 19 मीटर ऊंचे बराज का निर्माण किया जाएगा। इसके बाद विशेष जल संरचनाओं और सुरंगों के माध्यम से पानी को ब्यास बेसिन की ओर मोड़ने की व्यवस्था विकसित की जाएगी।
विशेषज्ञों के अनुसार इस परियोजना से उपलब्ध जल संसाधनों के उपयोग की क्षमता बढ़ेगी और भविष्य में अतिरिक्त पानी को देश के अन्य क्षेत्रों तक पहुंचाने की संभावनाएं भी मजबूत होंगी।
दूसरी महत्वपूर्ण योजना जम्मू-कश्मीर के रियासी जिले स्थित सलाल जलविद्युत परियोजना से जुड़ी हुई है। इस परियोजना पर लगभग 268 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का प्रस्ताव है।
योजना के तहत एक नया डायवर्जन-कम-सेडिमेंट बाईपास टनल बनाया जाएगा। लंबे समय से पहाड़ी क्षेत्रों से आने वाली गाद और मिट्टी के कारण बांध की जल भंडारण क्षमता प्रभावित होती रही है।
सरकारी आकलन के मुताबिक गाद जमने की वजह से सलाल बांध की भंडारण क्षमता घटकर करीब पांच प्रतिशत तक पहुंच गई है। नई सुरंग बनने के बाद गाद निकासी की प्रक्रिया अधिक प्रभावी हो सकेगी, जिससे परियोजना की क्षमता में सुधार की उम्मीद है।
सरकार का मानना है कि दोनों परियोजनाओं के पूरा होने के बाद देश की जल प्रबंधन व्यवस्था को नई मजबूती मिलेगी। इससे सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, जल संरक्षण में सुधार और बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार यह पहल केवल जल संसाधनों के उपयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि दीर्घकालिक जल सुरक्षा रणनीति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जा रही है। आने वाले वर्षों में इन परियोजनाओं का प्रभाव देश के कई क्षेत्रों में देखने को मिल सकता है।
जल संसाधनों के बेहतर उपयोग की दिशा में उठाया गया यह कदम रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकार का फोकस उन संसाधनों के अधिकतम उपयोग पर है, जिन पर भारत का अधिकार है। इसी उद्देश्य के तहत बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और नई परियोजनाओं को गति देने का प्रयास किया जा रहा है।
यदि निर्धारित योजना के अनुसार काम आगे बढ़ता है तो आने वाले वर्षों में सिंधु बेसिन से जुड़े जल प्रबंधन ढांचे में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
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