प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना विवाद
कहते हैं “दिखावे की चकाचौंध अक्सर हकीकत की धूप में फीकी पड़ जाती है” और प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. बड़े-बड़े वादे, लाखों इंटर्नशिप, युवाओं के चमकते करियर… सब सुनने में तो “सोने पर सुहागा” लग रहा था. लेकिन जब असली वक्त आया, तो पता चला कि मामला तो “नाम बड़े और दर्शन छोटे” वाला निकला. कंपनियों ने लाखों ऑफर भेजे, पर युवाओं ने हाथ खींच लिया. जैसे किसी ने थाली सजाई हो, पर खाने वाले ही न आएं. संसद में रखे गए आंकड़ों ने साफ कर दिया कि युवाओं की रुचि इस योजना में उम्मीद से कहीं कम है.
प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना को लेकर सरकार ने बड़े-बड़े दावे किए थे—एक साल में 1.25 लाख इंटर्नशिप के मौके, देश के युवाओं को टॉप 500 कंपनियों में काम का एक्सपोजर और करियर की दिशा में एक बड़ी शुरुआत. लेकिन असल तस्वीर बिल्कुल उलटी निकली. संसद में रखे गए आंकड़े बताते हैं कि युवा इस योजना में खास दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं.
कॉर्पोरेट अफेयर्स के राज्य मंत्री हर्ष मल्होत्रा ने लोकसभा में बताया कि अभी तक कंपनियों ने करीब 1.65 लाख इंटर्नशिप ऑफर दिए, लेकिन इनमें से सिर्फ 20% ऑफर ही युवाओं ने स्वीकार किए. यानी हर 10 ऑफर में सिर्फ दो ही एक्सेप्ट हुए.
यही नहीं—जिन्होंने इंटर्नशिप जॉइन की, उनमें से भी करीब 20% ने बीच में ही छोड़ दी, वजह? ज्यादातर उम्मीदवारों ने लोकेशन, रोल और स्टाइपेंड को लेकर असहमति जताई. यानी ऑफर तो अच्छा था, लेकिन ग्राउंड लेवल पर चीज़ें फिट नहीं बैठीं.
पहला राउंड: ऑफर्स ज़्यादा, जॉइन करने वाले बेहद कम
पायलट प्रोजेक्ट के पहले चरण में कंपनियों ने 1.27 लाख इंटर्नशिप पोस्ट कीं और पोर्टल पर 6.21 लाख आवेदन आए. लेकिन जब ऑफर देने की बारी आई, तो अक्टूबर 2024 में 82,000 ऑफर भेजे गए, जिनमें से सिर्फ 8,700 युवाओं ने हाँ कहा—यानी सिर्फ 10.6%. बाद में पता चला कि पहले राउंड के आधे से ज़्यादा इंटर्न्स ने इंटर्नशिप पूरी होने से पहले ही छोड़ दी थी.
दूसरा राउंड: थोड़ा बेहतर, लेकिन तस्वीर अभी भी फीकी
जनवरी 2025 से दूसरे चरण में कंपनियों ने 83,000 ऑफर दिए, जिनमें से लगभग 30% स्वीकार किए गए.
दोनों राउंड मिलाकर—
1.65 लाख ऑफर, सिर्फ 33,300 ने किया स्वीकार, और इनमें से 6,618 युवाओं ने बीच में ही छोड़ दिया.
बजट भी आधा हो गया
इस पायलट प्रोजेक्ट के लिए शुरुआत में ₹840 करोड़ का बजट रखा गया था. लेकिन स्वीकार्यता कम होने की वजह से इसे घटाकर ₹380 करोड़ कर दिया गया.
अब तक इस योजना में सिर्फ ₹73.72 करोड़ ही खर्च हुए हैं.
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