दुनिया में हर साल लाखों बच्चे पैदा होते हैं, लेकिन कुछ ऐसे होते हैं जो समय की धारा को ही बदल देते हैं। बेल्जियम के एक छोटे से शहर से निकले लॉरेंट सिमंस की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। ये कहानी किसी मार्वल फिल्म की स्क्रिप्ट जैसी लग सकती है, लेकिन ये हकीकत है जो आज हमारे सामने घट रही है।
जब खिलौनों की जगह इक्वेशंस ने ली
जरा सोचिए, एक 8 साल का बच्चा क्या कर रहा होगा? शायद वीडियो गेम्स खेल रहा होगा या स्कूल के होमवर्क से भाग रहा होगा। लेकिन 2018 में, 8 साल की उम्र में लॉरेंट ने अपना हाई स्कूल खत्म कर लिया था। जिस उम्र में बच्चे ‘सुपरमैन’ और ‘आयरन मैन’ की कॉमिक्स पढ़कर उनके जैसा बनने का सपना देखते हैं, लॉरेंट असल दुनिया में वो तकनीक विकसित करने की नींव रख रहा था। लोग उसे “लिटिल आइंस्टीन” पुकारने लगे, लेकिन लॉरेंट को पता था कि उसका मिशन आइंस्टीन से भी आगे जाने का है।
रफ़्तार, जो फिज़िक्स को भी हैरान कर दे
लॉरेंट का दिमाग किसी सुपर-कंप्यूटर की तरह काम करता है। लॉरेंट ने अपनी कॉलेज की पढ़ाई उस रफ़्तार से पूरी की कि दुनिया देखती रह गई। जहाँ 8 साल के बच्चे मिडिल स्कूल में होते हैं, लॉरेंट ने फिजिक्स में अपनी बैचलर डिग्री हासिल कर ली, और वो भी महज एक साल के अन्दर और 15 साल की उम्र लॉरेंट ने क्वांटम फिजिक्स में अपनी PhD पूरी करके इतिहास रच दिया।

लॉरेंट का रिसर्च फोकस ‘Bose Polarons’ जैसे अल्ट्रा-कॉम्प्लेक्स पार्टिकल्स पर रहा है। क्वांटम फिजिक्स जिसे समझना लीजेंडरी साइंटिस्ट्स के लिए भी टफ माना जाता है वो लॉरेंट के लिए जैसे सेकंड नेचर है। लैब में सफ़ेद कोट पहनकर जब वे ब्लैकबोर्ड पर हाई-लेवल मैथमेटिकल इक्वेशंस लिखते हैं, तो उनके साथ काम कर रहे 50–60 साल के सीनियर प्रोफेसर्स तक हैरान रह जाते हैं।
लॉरेंट का अल्टीमेट विजन
लेकिन असली कहानी डिग्री में नहीं, बल्कि उस ‘जुनून’ में है जो लॉरेंट को आगे बढ़ा रहा है। जब उनसे पूछा गया कि वो इतनी मेहनत क्यों कर रहे हैं, तो उनका जवाब किसी को भी हैरान कर सकता है। लॉरेंट ने कहा की ‘मेरा टारगेट है इम्मोर्टल बनना’।
लॉरेंट का मानना है कि मानव शरीर दुनिया की सबसे बेहतरीन लेकिन कमज़ोर मशीन है। उनके अनुसार, मौत कोई अंत नहीं, बल्कि एक ‘बायोलॉजिकल एरर’ या बीमारी है जिसे विज्ञान से ठीक किया जा सकता है। उनका विजन ‘सुपरह्यूमन’ तैयार करना है:
लॉरेंट चाहते हैं कि अगर किसी का दिल, फेफड़ा या किडनी खराब हो जाए, तो उसे दवाइयों के भरोसे छोड़ने के बजाय ‘लेटेस्ट टेक्नोलॉजी’ वाले आर्टिफिशियल अंगों से बदल दिया जाए। लॉरेंट एक ऐसा भविष्य देखते हैं जहाँ इंसान और मशीन एक हो जाएंगे। वो चाहते हैं कि हमारी यादें, हमारी कॉन्शियसनेस एक चिप या क्लाउड पर सेफ रहे, ताकि शरीर भले ही खत्म हो जाए पर इंसान का अस्तित्व कभी न मिटे।
‘ह्यूमन वर्जन 2.0’
आज, PhD की डिग्री हाथ में होने के बावजूद लॉरेंट रुके नहीं हैं। उन्होंने अब मेडिसिन (चिकित्सा विज्ञान) में अपनी दूसरी PhD शुरू कर दी है। लॉरेंट का कहना है की वो जानते हैं कि ‘सुपरह्यूमन’ बनाने के लिए सिर्फ फिजिक्स काफी नहीं है, उन्हें इंसानी शरीर की रग-रग से वाकिफ होना होगा।
उनका मिशन अब फिजिक्स की ‘क्वांटम थ्योरी’ को बायोलॉजी के साथ जोड़ना है। वो एक ऐसी टेक्नोलॉजी पर काम कर रहे हैं जहाँ नैनो-रोबॉट्स हमारे खून में तैरकर बीमारियों को जड़ से खत्म कर सकें और बुढ़ापे को हमेशा के लिए रोक सकें।
मौत अब अंतिम सच नहीं?
लॉरेंट सिमंस की ये यात्रा हमें एक ऐसे मोड़ पर ले आई है जहाँ विज्ञान और चमत्कार के बीच की लाइन धुंधली पड़ गई है। वो महज एक ‘जीनियस’ बच्चा नहीं है, बल्कि वो उस भविष्य का आर्किटेक्ट है जहाँ ‘डेथ अब फिक्स नहीं, बल्कि एक ऑप्शन होगी’।