नई दिल्ली, हाल ही देश के नये उपराष्ट्रपति चुने गए सीपी राधाकृष्णन द्वारा बुलाई गई पहली ही फ्लोर लीडर्स की बैठक काफी गरम माहौल में हुई. ये बैठक मंगलवार को बुलाई गई थी. विपक्षी दलों ने इस बैठक में सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि केंद्र संसद में न तो जवाब देना चाहती है और न ही पारदर्शिता दिखा रही है. बैठक में राज्यसभा में नेता और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा भी शामिल थे. इस दौरान वामपंथी दलों के सांसदों ने खासतौर पर यह मुद्दा उठाया कि संसद में कई ऐसे सवालों को मंजूरी नहीं दी जा रही, जिनका सीधा संबंध जनता के हकों और जानकारियों से है.
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPI-M) के सांसद जॉन ब्रिटास ने कहा कि ‘सरकार जानबूझकर ऐसे सवालों से बच रही है जिनसे वह जवाबदेह ठहराई जा सकती है’. उन्होंने बताया कि ‘उन्होंने नए संसद भवन की लागत से जुड़ा सवाल पूछा था, जिसे खारिज कर दिया गया. इसी तरह, पेट्रोलियम उत्पादों के आयात पर एक सवाल को गोपनीय बताकर स्वीकार नहीं किया गया, जबकि ऐसी जानकारियां तेल कंपनियां खुद सार्वजनिक करती हैं’. विपक्ष का कहना है कि ये रुख लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है. एक विपक्षी सांसद ने कहा “जब संसद में भी सवालों की गुंजाइश नहीं रह गई, तो फिर जवाबदेही की उम्मीद कहां की जाए?”
सूत्रों के मुताबिक, भाजपा की ओर से इन आरोपों पर कोई सीधा जवाब नहीं दिया गया, लेकिन यह जरूर कहा गया कि संसद में पूछे जाने वाले सभी सवालों की छंटनी नियमों के अनुसार होती है. गौरतलब है कि हाल के सत्रों में लगातार यह देखा गया है कि विपक्षी सांसदों के सवाल खारिज किए जा रहे हैं, साथ ही कई बार उनके निलंबन जैसे कदम भी उठाए गए हैं. विपक्ष का मानना है कि इससे संसद की लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर हो रही है, जबकि सरकार का दावा है कि वह सदन में अनुशासन और सौहार्द बनाए रखना चाहती है.