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न्यूक्लियर ब्लैकआउट! ईरान के ‘सीक्रेट’ यूरेनियम पर IAEA बेखबर, ट्रंप की ‘मैक्सिमम प्रेशर 2.0’ नीति रोक पाएगी परमाणु जंग?

मिडिल ईस्ट में चल रहा परमाणु तनाव अब एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है, जहां अंतरराष्ट्रीय समुदाय पूरी तरह से अंधेरे में तीर चला रहा है। हालिया सैन्य टकराव और अमेरिकी-इजरायली हमलों के बाद, ईरान ने अपने परमाणु ठिकानों के दरवाजे वैश्विक निगरानी संस्था IAEA (International Atomic Energy Agency) के लिए पूरी तरह बंद कर दिए हैं। इस ‘वेरिफिकेशन ब्लैकआउट’ ने दुनिया के सबसे बड़े खुफिया संगठनों की रातों की नींद उड़ा दी है।

कहाँ गया 440 किलो ‘बम-ग्रेड’ यूरेनियम?

सबसे बड़ा और डरावना सवाल ईरान के 60% तक संवर्धित यूरेनियम के स्टॉक को लेकर है। हमलों से पहले, IAEA के रिकॉर्ड में ईरान के पास लगभग 440 किलोग्राम ऐसा यूरेनियम था, जिसे मामूली तकनीकी अपग्रेड के साथ सीधे परमाणु हथियारों (90% वेपन-ग्रेड) में बदला जा सकता था।

अमेरिकी दावों के मुताबिक हमलों में ईरान के परमाणु इंफ्रास्ट्रक्चर को भारी नुकसान पहुंचा है, लेकिन ग्राउंड जीरो से आ रही रिपोर्ट्स बताती हैं कि यह खतरनाक यूरेनियम का स्टॉक गायब है। क्या ईरान ने इसे भूमिगत बंकरों में शिफ्ट कर दिया? या इसे सुरक्षित ठिकानों पर पहुंचाकर अब हथियार बनाने की आखिरी प्रक्रिया शुरू की जा रही है? इन सवालों पर IAEA के पास फिलहाल कोई जवाब नहीं है।

डोनाल्ड ट्रंप का दावा बनाम जमीनी हकीकत

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि उनकी सैन्य और आर्थिक कार्रवाई ने ईरान के परमाणु मंसूबों की रीढ़ तोड़ दी है। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि ईरान आर्थिक रूप से बेहद कमजोर हो चुका है और अब वह कोई नया मोर्चा खोलने की स्थिति में नहीं है।

लेकिन, IAEA के महानिदेशक “राफेल ग्रॉसी” इस आकलन से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। ग्रॉसी के अनुसार, “परमाणु ज्ञान और यूरेनियम संवर्धन की तकनीक को बमबारी से मिटाया नहीं जा सकता।” विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के पास ऐसा तकनीकी ज्ञान और छिपे हुए सेंट्रीफ्यूज (Centrifuges) मौजूद हैं, जिनकी मदद से वह कुछ ही महीनों में फिर से अपना परमाणु कार्यक्रम खड़ा कर सकता है।

‘मैक्सिमम प्रेशर 2.0’ और ईरान की जिद

वाशिंगटन ने ईरान पर एक बार फिर ‘मैक्सिमम प्रेशर’ की नीति लागू कर दी है, जिसका उद्देश्य ईरान को पूरी तरह से अलग-थलग करना है। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने ईरान के खिलाफ सख्त निंदा प्रस्ताव भी पारित कराया है, जिसमें ईरान से अपने यूरेनियम स्टॉक का पूरा हिसाब देने की मांग की गई है।

दूसरी ओर, तेहरान का रुख पहले से कहीं अधिक आक्रामक है। ईरान के शीर्ष नेतृत्व का साफ कहना है कि जब तक अमेरिका प्रतिबंधों को पूरी तरह नहीं हटाता और सुरक्षा की गारंटी नहीं देता, तब तक अंतरराष्ट्रीय जांचकर्ताओं को उनके ठिकानों की हवा भी नहीं लगने दी जाएगी।

क्या दुनिया एक बड़ी परमाणु जंग की ओर बढ़ रही है?

इस ‘न्यूक्लियर ब्लाइंडनेस’ (यानी परमाणु कार्यक्रम की जानकारी न होना) ने मिडिल ईस्ट में एक नया ‘सुरक्षा संकट’ पैदा कर दिया है। जब तक IAEA को ईरान के ठिकानों पर लाइव एक्सेस नहीं मिलता, तब तक यह अनुमान लगाना असंभव है कि ईरान परमाणु बम बनाने से कितने दिन दूर है।

यह अनिश्चितता इजरायल और अमेरिका को किसी बड़े ‘प्री-एम्प्टिव स्ट्राइक’ के लिए उकसा सकती है, जो आगे चलकर इस पूरे क्षेत्र को एक विनाशकारी परमाणु युद्ध की आग में झोंक सकती है। दुनिया इस समय एक बेहद पतली लकीर पर चल रही है, जहाँ एक भी गलत कदम वैश्विक इतिहास को बदल सकता है।

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