ग्लोबल टेक मार्केट में कंपोनेंट्स की बढ़ती कीमतों ने नए स्मार्टफोन को आम भारतीय कंज्यूमर की रीच से दूर करना शुरू कर दिया है। मेमोरी चिप और डिस्प्ले पैनल्स महंगे होने की वजह से टेक ब्रांड्स लगातार अपने नए हैंडसेट्स के दाम बढ़ा रहे हैं। जिसका नतीजा ये हुआ की स्मार्टफोन मार्केट में एक बड़ा शिफ्ट आ रहा है।
अब लोग भारी-भरकम पैसे खर्च करके बिल्कुल नया फोन अनबॉक्स करने के बजाय ‘रिफर्बिश्ड’ “सर्टिफाइड प्री-ओन्ड” डिवाइसेज को अपनी पहली चॉइस बना रहे हैं। अपग्रेड का यह नया पैटर्न इंडियन स्मार्टफोन इंडस्ट्री का पूरा गेम बदल रहा है।
काउंटरपॉइंट रिसर्च की लेटेस्ट रिपोर्ट इस ट्रेंड पर मुहर लगाती है। रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2026 में भारत का रिफर्बिश्ड स्मार्टफोन मार्केट 12% की सालाना ग्रोथ दर्ज करने की राह पर है। इसके ठीक उलट, ब्रांड-न्यू स्मार्टफोन मार्केट में इस साल भारी सुस्ती है और इसके कुल शिपमेंट में 11% की गिरावट का अनुमान है। यह आंकड़े साफ करते हैं कि कंज्यूमर्स अब सिर्फ ‘न्यू’ टैग के पीछे भागने के बजाय वैल्यू-फॉर-मनी डील्स को ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं।
स्मार्टफोन्स की बढ़ती कीमतों का ही असर है कि करीब 14% यूजर्स ने नया फोन खरीदने का प्लान ड्रॉप कर दिया है और वे सीधे सर्टिफाइड रिफर्बिश्ड ऑप्शंस को एक्सप्लोर कर रहे हैं। वजह सिंपल है—नए और री-यूज़्ड फोंस के बीच का प्राइस गैप लगातार बड़ा हो रहा है। एक मिडल-क्लास बायर जो पहले 30,000 से 40,000 रुपए के बजट में एक एवरेज नया फोन ले पाता था, आज उतने ही बजट में उसे रिफर्बिश्ड मार्केट में फ्लैगशिप फीचर्स वाले टॉप-एंड प्रीमियम डिवाइसेज (जैसे आईफोन या सैमसंग गैलेक्सी एस सीरीज) आसानी से मिल रहे हैं।
इस ट्रेंड का सबसे पॉजिटिव इम्पैक्ट यह हुआ है कि इंडियन्स का ‘ट्रेड-इन’ यानी फोन एक्सचेंज करने का बिहेवियर बदल गया है। पहले लोग अपना पुराना फोन बदलने के बाद उसे घर की किसी दराज में बेकार पड़ा रहने देते थे। लेकिन अब नया फोन लेते वक्त अपनी जेब पर पड़ने वाले बोझ को कम करने के लिए लोग तुरंत वर्किंग फोन को एक्सचेंज कर रहे हैं। टेक एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस कदम से सेकेंडरी स्मार्टफोन मार्केट में डिवाइसों की सप्लाई मजबूत होगी और रिफर्बिश्ड प्लेटफॉर्म्स पर ऑप्शंस की कोई कमी नहीं रहेगी।
भारत के बड़े रिफर्बिश्ड स्मार्टफोन प्लेटफॉर्म ‘कैशिफाई’ (Cashify) ने भी इस मार्केट शिफ्ट को कन्फर्म किया है। उनके मुताबिक, ट्रेड-इन प्रोग्राम्स को लेकर कंज्यूमर्स में गजब का एक्साइटमेंट और डिमांड है। ऑर्गेनाइज्ड ट्रेड-इन अब भारतीय कंज्यूमर्स के मोबाइल अपग्रेड साइकिल का एक परमानेंट और जरूरी हिस्सा बन चुका है।
एक्सपर्ट्स का कहना है की सर्टिफाइड प्री-ओन्ड प्लेटफॉर्म्स के आने से अब सेकंड हैंड फोंस को लेकर डर खत्म हो गया है, क्योंकि यहाँ ग्राहकों को कड़े क्वालिटी चेक के साथ-साथ बकायदा वारंटी भी मिलती है। कम कीमत में लेटेस्ट टेक्नोलॉजी को एक्सपीरियंस करने और पैसे बचाने का यह मॉडर्न तरीका न सिर्फ एक स्मार्ट फाइनेंशियल डिसीजन है, बल्कि ई-वेस्ट को कम करने की दिशा में भी एक बेहतरीन और जिम्मेदार कदम है।
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