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चिप मैन्युफैक्चरिंग में ग्लोबल पावरहाउस बनने की राह पर भारत! 2035 तक 33.54 लाख करोड़ का होगा घरेलू मार्केट

ग्लोबल टेक सप्लाई चेन में अपनी मजबूत पकड़ बनाने के लिए भारत अब पूरी तरह तैयार है। ‘फैब इकोनॉमिक्स’ की लेटेस्ट रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का सेमीकंडक्टर और कंपोनेंट मार्केट आने वाले वर्षों में रॉकेट की रफ्तार से बढ़ने वाला है। साल 2035 तक इसके 350 बिलियन डॉलर (लगभग 33.54 लाख करोड़ रुपये) के ऑल-टाइम हाई स्तर पर पहुंचने का अनुमान है। यह ग्रोथ न केवल भारत की डिजिटल रीढ़ को मजबूत करेगी, बल्कि चिप के मामले में विदेशी निर्भरता को भी लगभग खत्म कर देगी।

9 सालों में 6 गुना से ज्यादा की विस्फोटक ग्रोथ

रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय चिप मार्केट एक बड़े ट्रांसफॉर्मेशन से गुजर रहा है।

साल 2026 में भारत में सेमीकंडक्टर डिवाइस और कंपोनेंट्स की घरेलू खपत 54 बिलियन डॉलर (लगभग 5.17 लाख करोड़ रुपये) होने का अनुमान है। यह आंकड़ा अगले चार सालों यानी 2030 तक ढाई गुना बढ़कर 130 बिलियन डॉलर (लगभग 12.46 लाख करोड़ रुपये) पर पहुंच जाएगा।वहीं, साल 2035 तक यह मार्केट 350 बिलियन डॉलर का आंकड़ा छू लेगा, जो आज के मुकाबले 6 गुना से भी ज्यादा की छलांग है।

आयात पर निर्भरता में रिकॉर्ड गिरावट

वर्तमान में भारत अपने फैब प्रोजेक्ट्स की कुल लागत का 85% से अधिक हिस्सा और वेफर मैन्युफैक्चरिंग का लगभग 50% हिस्सा आयात करता है। लेकिन घरेलू स्तर पर फैब्रिकेशन और एडवांस पैकेजिंग कैपेसिटी मजबूत होने से इस स्थिति में नाटकीय बदलाव आएगा।

साल 2030 तक फैब प्रोजेक्ट्स की आयात निर्भरता घटकर 68% और वेफर की 30% रह जाएगी। सबसे बड़ा गेम-चेंजर साल 2035 होगा, जब भारत दुनिया के टॉप सेमीकंडक्टर क्लस्टर्स (जैसे ताइवान, अमेरिका) के बेंचमार्क से मैच करने लगेगा। तब प्रोजेक्ट्स के लिए आयात पर निर्भरता सिर्फ 55% और वेफर के लिए मात्र 18% रह जाएगी। यही नहीं, घरेलू उत्पादन और निर्यात से होने वाली कमाई के दम पर भारत अपने कुल चिप आयात बिल के 20% से अधिक हिस्से की भरपाई खुद करने में सक्षम हो जाएगा।

इम्पोर्ट डिपेंडेंसी ट्रेंड की बात करें तो चिप मैन्युफैक्चरिंग में भारत की विदेशी निर्भरता में आने वाले समय में बड़ी गिरावट देखने को मिलेगी। जहां वर्तमान 2026 में फैब प्रोजेक्ट्स के लिए आयात निर्भरता 85% से अधिक और वेफर निर्माण के लिए 50% है, वहीं साल 2030 तक यह घटकर क्रमशः 68% और 30% पर आ जाएगी।

सबसे बड़ा सुधार साल 2035 तक देखने को मिलेगा जब भारत वैश्विक बेंचमार्क से मुकाबला करते हुए प्रोजेक्ट आयात को 55% और वेफर आयात को सिर्फ 18% तक समेट देगा। इसके अलावा, शुरुआती चरण से निकलकर भारत 2035 तक अपने घरेलू प्रोडक्शन और निर्यात के रेवेन्यू से कुल चिप आयात बिल के 20% से अधिक हिस्से की रिकवरी करने में भी पूरी तरह सक्षम हो जाएगा। 

80 बिलियन के मेगा इंसेंटिव की जरूरत

फैब इकोनॉमिक्स ने इस बात पर विशेष जोर दिया है कि आयात पर निर्भरता को तेजी से घटाने के लिए सरकार की तरफ से लगातार वित्तीय सहायता और नीतिगत निरंतरता बेहद जरूरी है।

2030 तक: इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के तीन चरणों (ISM 1.0, 2.0 और 3.0) के तहत केंद्र और राज्यों को मिलकर कुल 40 बिलियन डॉलर (लगभग 3.83 लाख करोड़ रुपये) की इंसेंटिव राशि जारी रखनी होगी।

आगे की रफ्तार के लिए: इसके बाद इस गति को बनाए रखने के लिए ISM 4.0 और 5.0 के रूप में दो और अतिरिक्त पैकेज की जरूरत होगी, जिनमें से प्रत्येक में 20 बिलियन डॉलर (लगभग 1.92 लाख करोड़ रुपये) की इन्क्रीमेंटल सब्सिडी शामिल होगी।

नए डिजिटल युग का नेतृत्व

भारत के स्मार्टफोन, ऑटोमोटिव (EVs), एआई (AI) और कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर्स में जिस तरह चिप की डिमांड दिन-ब-दिन बढ़ रही है, उसे देखते हुए यह रिपोर्ट बेहद सटीक संकेत देती है। यदि सरकार और टेक इंडस्ट्री मिलकर इस 80 बिलियन डॉलर के सब्सिडी रोडमैप और एक्जीक्यूशन को सही टाइमलाइन पर आगे बढ़ाते हैं, तो भारत केवल एक ‘कंज्यूमर मार्केट’ न रहकर दुनिया का सबसे भरोसेमंद और आत्मनिर्भर सेमीकंडक्टर हब बनकर उभरेगा।

news desk

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