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नो शॉर्टकट! संभल, मथुरा और ज्ञानवापी विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का ‘मध्यस्थता’ फॉर्मूला फेल, दोनों पक्षों ने कहा -‘फैसला तो कोर्ट ही करेगा’

देश के सबसे संवेदनशील और बड़े धार्मिक स्थलों के विवादों “संभल, मथुरा और वाराणसी के ज्ञानवापी” मामले को आपसी बातचीत से सुलझाने की सुप्रीम कोर्ट की कोशिशों को बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने इन मामलों से जुड़े हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों के सामने ‘आउट-ऑफ-कोर्ट सेटलमेंट’ मीडिएशन  यानी “मध्यस्थता” का प्रस्ताव रखा था, जिसे दोनों ही पक्षों ने सिरे से खारिज कर दिया है।

दोनों पक्षों का साफ कहना है कि इन मामलों में जटिल कानूनी पेच फंसे हुए हैं, इसलिए इनका समाधान केवल और केवल अदालत की नियमित सुनवाई के जरिए ही मुमकिन है।

क्या था सुप्रीम कोर्ट का प्लान?

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट 21 से 23 अगस्त के बीच ‘समाधान समारोह’ नाम से एक विशेष लोक अदालत कार्यक्रम का आयोजन करने जा रहा है। इस मेगा ड्राइव का मकसद सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग पड़े उन हजारों मुकदमों का निपटारा करना है, जिन्हें आपसी बातचीत, समझौते या सहमति के जरिए सुलझाया जा सकता है।

इसी रूटीन प्रोसेस के तहत, कोर्ट ने देश के अन्य बड़े मामलों के साथ-साथ संभल, मथुरा और ज्ञानवापी विवाद के पक्षकारों को भी नोटिस भेजकर पूछा था कि क्या वे बातचीत की मेज पर बैठकर इस विवाद को हमेशा के लिए खत्म करना चाहते हैं?

दोनों पक्षों ने क्यों कहा ‘नो थैंक्स’?

आमतौर पर मुकदमों के लंबे खींचने से परेशान पक्षकार लोक अदालत के विकल्प को चुन लेते हैं, लेकिन इस हाई-प्रोफाइल मामले में कहानी उलट गई:

जटिल कानूनी सवाल: हिंदू और मुस्लिम दोनों ही पक्षों के वकीलों और नुमाइंदों का मानना है कि यह कोई मामूली जमीन का टुकड़ा या पैसों का लेन-देन नहीं है। इसमें ‘प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट 1991’ जैसे बड़े और गंभीर कानूनी सवाल शामिल हैं।

अदालती मुहर जरूरी: दोनों पक्षों का स्टैंड बिल्कुल क्लियर है कि इस तरह के ऐतिहासिक और संवेदनशील मामलों का कोई भी फैसला बिना पूरी कानूनी बहस और सुप्रीम कोर्ट की फाइनल रूलिंग के बिना देश को स्वीकार्य नहीं होगा।

आगे क्या होगा?

पक्षकारों की इस असहमति के बाद अब यह साफ हो गया है कि संभल, मथुरा की शाही ईदगाह और वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद से जुड़े इन मामलों पर कोई ‘शॉर्टकट’ रास्ता नहीं अपनाया जाएगा। ‘समाधान समारोह’ की लिस्ट से अब ये मामले बाहर हो चुके हैं, जिसका सीधा मतलब है कि अब सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस और देश के दिग्गज वकील अदालत रूम में ही अपनी दलीलों और सबूतों के साथ आमने-सामने होंगे।

news desk

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