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NDA Power Shift: नीतीश-नायडू का ‘किंगमेकर’ टैग खतरे में? विपक्ष की टूट से बढ़ा PM मोदी का कुनबा, बदल गया दिल्ली का समीकरण!

भारतीय राजनीति के गलियारों से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर एनडीए (NDA) के भीतर बदलते पावर बैलेंस को लेकर आ रही है। केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के ‘किंगमेकर’ कहे जाने वाले जदयू (JDU) प्रमुख नीतीश कुमार और टीडीपी (TDP) चीफ चंद्रबाबू नायडू की मुश्किलें आने वाले दिनों में बढ़ सकती हैं।

राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि विपक्ष में मची आपसी कलह के बीच नीतीश और नायडू की ‘बार्गेनिंग पावर’ (सौदेबाजी की ताकत) अब पहले जैसी नहीं रही।

दरअसल, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की टीएमसी (TMC) और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) में जारी अंदरूनी खींचतान का सीधा फायदा बीजेपी नेतृत्व वाले एनडीए को मिलने जा रहा है, जिससे गठबंधन का कुनबा और मजबूत हो रहा है।

अगर नीतीश-नायडू हटें भी, तब भी पूरी तरह सुरक्षित रहेगी मोदी सरकार!

इस नए राजनीतिक पुनर्संयोजन (Political Realignment) के बाद जो समीकरण बन रहे हैं, उसने सहयोगियों की चिंता बढ़ा दी है:

  • बागी सांसदों की पहली पसंद BJP: विभिन्न विपक्षी दलों से असंतुष्ट या बगावती रुख अपनाने वाले सांसदों की प्राथमिक पसंद आने वाले समय में एनडीए या सीधे तौर पर भारतीय जनता पार्टी बनती दिख रही है।
  • लोकसभा में 300 पार का नया गणित: विशेषज्ञों का मानना है कि संभावित जोड़-तोड़ और दल-बदल की स्थिति में एनडीए का संख्या बल उल्लेखनीय रूप से बढ़ सकता है। यह आंकड़ा लोकसभा में आसानी से 300 के करीब पहुंच सकता है।
  • समर्थन वापसी का डर खत्म: यदि ऐसा होता है, तो टीडीपी या जदयू अगर केंद्र सरकार से अपना समर्थन वापस भी ले लें, तब भी मोदी सरकार संसद (लोकसभा और राज्यसभा) में पूरी तरह सुरक्षित रहेगी।

मोदी कैबिनेट विस्तार में दिखेगी झलक, बागियों की होगी चांदी!

सूत्रों के मुताबिक, आने वाले दिनों में होने वाले मोदी सरकार के कैबिनेट विस्तार में इस नई रणनीति की साफ झलक देखने को मिल सकती है।

किंगमेकर्स बैकफुट पर: कयास लगाए जा रहे हैं कि विपक्ष से पाला बदलकर आने वाले बागी नेताओं को पीएम मोदी सीधे अपनी नई टीम यानी केंद्रीय कैबिनेट में जगह दे सकते हैं। अगर ऐसा होता है, तो नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू का राजनीतिक दबाव पूरी तरह खत्म हो जाएगा।

सिद्धांतों पर भारी ‘व्यक्तिगत लाभ’, बिखरता जा रहा है विपक्ष

इस पूरे परिदृश्य ने भारतीय लोकतंत्र की एक चिंताजनक प्रवृत्ति को भी उजागर किया है:

  • सिद्धांतों से समझौता: जनता के विश्वास से संसद तक पहुंचने वाले जनप्रतिनिधि अब सिद्धांतों से अधिक अपने व्यक्तिगत लाभ-हानि का आकलन कर रहे हैं। राजनीतिक दल बदलना अब एक रणनीति नहीं, बल्कि सामान्य बात बन चुकी है।
  • कमजोर होता विपक्ष: लगातार हो रही टूट-फूट और आपसी संघर्ष ने विपक्ष की एकजुटता को तार-तार कर दिया है, जिसका सीधा राजनीतिक लाभ केंद्र की सत्तारूढ़ मोदी सरकार को मिल रहा है।
  • संवाद का गिरता स्तर: नेताओं की फिसलती जुबान न केवल शिष्टाचार की सीमाएं लांघ रही है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों को भी आहत कर रही है।


राज्यसभा में भी बढ़ेगा दबदबा

विपक्ष के इस बिखराव का फायदा एनडीए को सिर्फ लोकसभा में ही नहीं, बल्कि राज्यसभा में भी मिलेगा, जहां कई महत्वपूर्ण बिलों को पास कराने के लिए सरकार को कड़ा संघर्ष करना पड़ता था। कुल मिलाकर, एनडीए का बढ़ता कुनबा जहां पीएम मोदी को असीमित ताकत दे रहा है, वहीं नीतीश और नायडू जैसे कद्दावर सहयोगियों को टेंशन में डाल रहा है।

SYED MOHAMMAD ABBAS

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