नई दिल्ली: कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की एक किताब में न्यायपालिका से जुड़े कथित विवादित अध्याय को लेकर उठे विवाद के बाद अब National Council of Educational Research and Training ने सार्वजनिक तौर पर बिना शर्त माफी मांग ली है। दो हफ्ते पहले Supreme Court of India ने इस किताब पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था।
एनसीईआरटी ने अखबारों में प्रकाशित एक अपील में कहा कि कक्षा 8 (भाग-II) की सामाजिक विज्ञान की किताब “Exploring Society: India and Beyond” को पूरी तरह वापस ले लिया गया है और अब यह कहीं भी उपलब्ध नहीं होगी।
संस्था की ओर से जारी माफी में कहा गया कि इस किताब के चौथे अध्याय “The Role of Judiciary in our Society” को लेकर उठे विवाद के लिए एनसीईआरटी के निदेशक और सदस्य बिना शर्त और पूर्ण माफी मांगते हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि पूरी पुस्तक को वापस लेकर उसका वितरण और उपयोग रोक दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने लगाया था कड़ा प्रतिबंध
दरअसल यह मामला तब सुर्खियों में आया जब किताब के एक अध्याय में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार, लंबित मामलों और सिस्टम से जुड़ी चुनौतियों का जिक्र किया गया था। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए सुनवाई शुरू की थी।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश Surya Kant ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि इस तरह की सामग्री न्यायपालिका की गरिमा को कमजोर करने की कोशिश है। उन्होंने साफ कहा था कि किसी को भी इस संस्था की साख को नुकसान पहुंचाने की अनुमति नहीं दी जाएगी और कानून अपना रास्ता जरूर अपनाएगा।
इसके बाद 26 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस किताब की छपाई, वितरण और डिजिटल प्रसार पर पूरी तरह रोक लगा दी थी और इसे एक “गहरी साजिश” तक बताया था।
स्कूलों और छात्रों को भी जारी हुए निर्देश
एनसीईआरटी ने अब स्पष्ट कर दिया है कि किताब को पूरी तरह वापस ले लिया गया है। साथ ही स्कूलों और छात्रों से कहा गया है कि वे इस पुस्तक का इस्तेमाल या अध्ययन न करें।
संस्था के अधिकारियों का कहना है कि अध्याय में कुछ “अनुचित सामग्री” अनजाने में शामिल हो गई थी, जिसे अब सुधारा जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में ऐसी सामग्री प्रकाशित होने से पहले और सख्त निगरानी रखी जाएगी।
इस पूरे विवाद के बाद शिक्षा जगत में एक नई बहस शुरू हो गई है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना न्यायपालिका की गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा का मजबूत संदेश देती है, लेकिन साथ ही पाठ्यपुस्तकों की सामग्री तैयार करते समय पारदर्शिता और संतुलन बनाए रखने की जरूरत को भी उजागर करती है।