समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आज़म खान द्वारा स्थापित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी इस समय अपने सबसे बड़े कानूनी संकट से गुजर रही है। यूनिवर्सिटी परिसर की 40 में से 38 इमारतों पर डिमोलिशन का खतरा मंडरा रहा है। पिछले कुछ समय में रामपुर विकास प्राधिकरण (RDA), आयकर विभाग, जल निगम, फायर विभाग और पीडब्ल्यूडी सहित कई सरकारी एजेंसियों ने अलग-अलग मामलों में कार्रवाई शुरू की है।
रामपुर विकास प्राधिकरण का कहना है कि यूनिवर्सिटी की अधिकांश इमारतों का निर्माण बिना अप्रूव्ड मैप के किया गया। जांच में पता चला कि 40 में से केवल 2 इमारतों के निर्माण की अनुमति संबंधित प्राधिकरण से ली गई थी, जबकि बाकी 38 इमारतों के लिए ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं मिला।
RDA का यह भी दावा है कि जिस जमीन पर यूनिवर्सिटी बनी है, वह सरकारी रिकॉर्ड में अब भी कृषि भूमि के रूप में दर्ज है। ऐसे में बिना भूमि उपयोग बदले बड़े शैक्षणिक भवनों का निर्माण नियमों के खिलाफ माना जा सकता है।
इन इमारतों में इंजीनियरिंग, लॉ, एग्रीकल्चर और इस्लामिक स्टडीज की फैकल्टी, सेंट्रल लाइब्रेरी, ऑडिटोरियम, छात्रावास और परिसर की दो मस्जिदें भी शामिल हैं।
यूनिवर्सिटी की मुश्किलें सिर्फ RDA तक सीमित नहीं हैं। पिछले एक महीने में कई विभागों ने अलग-अलग मामलों में कार्रवाई की है। आयकर विभाग ने यूनिवर्सिटी संचालित करने वाले मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया। विभाग का आरोप है कि चैरिटेबल ट्रस्ट की सुविधाओं का उपयोग नियमों के अनुरूप नहीं किया गया।
जल निगम ने 11.37 करोड़ रुपए की वसूली का नोटिस जारी किया है। आरोप है कि गांवों के लिए बने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) का लंबे समय तक यूनिवर्सिटी परिसर के लिए इस्तेमाल किया गया। फायर विभाग की जांच में कई इमारतों में फायर सेफ्टी व्यवस्था और आवश्यक फायर एनओसी की कमी सामने आई। पीडब्ल्यूडी ने यूनिवर्सिटी के मुख्य प्रवेश मार्ग को सार्वजनिक सड़क बताया है और उस पर किसी तरह की रोक लगाने पर आपत्ति जताई है।
रामपुर के जिलाधिकारी और RDA के उपाध्यक्ष अजय द्विवेदी का कहना है कि पूरी कार्रवाई कानून के अनुसार की जा रही है। उनके अनुसार जांच में पता चला कि केवल दो इमारतों का नक्शा स्वीकृत था। उनका सवाल है कि जब दो इमारतों के लिए अनुमति ली गई थी, तो बाकी इमारतों के लिए ऐसा क्यों नहीं किया गया।
यूनिवर्सिटी प्रशासन और समाजवादी पार्टी का कहना है कि यह कार्रवाई राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित है। उनका तर्क है कि जब इन इमारतों का निर्माण हुआ था, तब यह इलाका RDA के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता था। इसलिए उस समय RDA से नक्शा पास कराने का सवाल ही नहीं उठता। उनका कहना है कि वे इस मामले में अदालत का रुख करेंगे।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यूनिवर्सिटी के पास फिलहाल दो प्रमुख विकल्प हैं। पहला, RDA के आदेश के खिलाफ संबंधित अपीलीय प्राधिकरण के समक्ष अपील करना। दूसरा, ध्वस्तीकरण नोटिस और अन्य विभागों की कार्रवाई पर रोक के लिए हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करना।
फिलहाल यह मामला कानूनी प्रक्रिया में है और अंतिम फैसला अदालतों या संबंधित प्राधिकरणों के आदेश के बाद ही होगा। प्रशासन इसे नियमों के पालन की कार्रवाई बता रहा है, जबकि यूनिवर्सिटी और समाजवादी पार्टी इसे राजनीतिक कार्रवाई मान रहे हैं। ऐसे में हजारों छात्रों और यूनिवर्सिटी के भविष्य पर सबकी नजरें आगामी कानूनी फैसलों पर टिकी हैं।
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