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मिडिल ईस्ट तनाव का असर: LPG संकट के बीच भारत ने बदली रणनीति, घरेलू सप्लाई को दी प्राथमिकता

मार्च 2026 में भारत में रसोई गैस (LPG) की खपत में आई गिरावट ने ऊर्जा क्षेत्र की नीतियों और वैश्विक निर्भरता पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। पहली नजर में यह गिरावट मांग में कमी का संकेत लग सकती है, लेकिन असल कहानी सप्लाई चेन में आई बाधाओं और रणनीतिक प्राथमिकताओं के बदलाव की है।

आंकड़ों के अनुसार, मार्च में LPG की खपत घटकर 2.379 मिलियन टन रह गई, जो पिछले साल के इसी महीने के मुकाबले करीब 13 फीसदी कम है। यह गिरावट ऐसे समय में दर्ज की गई जब देश में साफ ईंधन को बढ़ावा देने की नीति लगातार आगे बढ़ रही है।

सप्लाई शॉक ने बदला गेम प्लान

भारत अपनी LPG जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है और इसका अधिकांश हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आता है। हालिया भू-राजनीतिक तनाव के कारण सप्लाई रूट प्रभावित हुए, जिससे आयात में अस्थायी बाधाएं पैदा हुईं। इस स्थिति ने सरकार को प्राथमिकताओं में बदलाव करने के लिए मजबूर कर दिया।

ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए, सरकार ने कमर्शियल और औद्योगिक उपयोग के लिए LPG सप्लाई में कटौती कर दी, ताकि घरेलू उपभोक्ताओं को किसी तरह की कमी का सामना न करना पड़े। इसका सीधा असर होटल, रेस्टोरेंट और इंडस्ट्री पर पड़ा, जहां खपत में भारी गिरावट दर्ज की गई।

घरेलू उपभोक्ता रहे सुरक्षित, लेकिन इंडस्ट्री पर दबाव

पेट्रोलियम सेक्टर के आंकड़े बताते हैं कि जहां घरेलू सिलेंडरों की बिक्री में हल्की गिरावट आई, वहीं गैर-घरेलू खपत में तेज गिरावट दर्ज की गई। थोक LPG सेगमेंट तो सबसे ज्यादा प्रभावित रहा, जहां खपत में 70 फीसदी से ज्यादा की गिरावट देखी गई।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह गिरावट मांग में कमी नहीं, बल्कि सप्लाई के पुनर्वितरण का नतीजा है। यानी, उपलब्ध गैस को प्राथमिकता के आधार पर घरेलू क्षेत्र में भेजा गया।

रिफाइनरी सेक्टर बना ‘बैकअप प्लान’

स्थिति को संभालने के लिए सरकार ने रिफाइनरीज को निर्देश दिए कि वे पेट्रोकेमिकल फीडस्टॉक का इस्तेमाल कम कर LPG उत्पादन बढ़ाएं। इस कदम का असर भी देखने को मिला, जहां घरेलू उत्पादन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई।

पूरे वित्त वर्ष 2025-26 में LPG उत्पादन बढ़कर 13.1 मिलियन टन तक पहुंच गया। यह संकेत है कि भारत अब आयात पर निर्भरता कम करने के लिए धीरे-धीरे घरेलू उत्पादन को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

ऊर्जा खपत का बदलता पैटर्न

दिलचस्प बात यह है कि जहां LPG और जेट फ्यूल की खपत प्रभावित हुई, वहीं पेट्रोल और डीजल की मांग में लगातार वृद्धि दर्ज की गई। यह दर्शाता है कि परिवहन और आर्थिक गतिविधियां सामान्य रफ्तार से जारी हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का असर विशेष रूप से गैस और एविएशन सेक्टर पर पड़ा है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि मिडिल ईस्ट में तनाव लंबा खिंचता है, तो भारत को अपनी ऊर्जा रणनीति में और बड़े बदलाव करने पड़ सकते हैं। इसमें आयात के वैकल्पिक स्रोत, स्टोरेज क्षमता बढ़ाना और घरेलू उत्पादन को और मजबूत करना शामिल हो सकता है।

फिलहाल, सरकार की प्राथमिकता साफ है—घरेलू रसोई तक गैस की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करना, भले ही इसके लिए उद्योगों को अस्थायी झटका क्यों न झेलना पड़े।

news desk

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