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Makkah Pact: क्या मक्का समझौते से एशिया में बनेगा ‘इस्लामिक नाटो’? भारत और वैश्विक शक्तियों की पैनी नज़र

क्या वेस्ट एशिया अब NATO जैसी सैन्य ताकत का नया केंद्र बनने जा रहा है? क्या दुनिया के मुस्लिम देश अपनी सुरक्षा के लिए पश्चिमी देशों पर निर्भर रहने के बजाय एक साझा रक्षा व्यवस्था खड़ी करने की तैयारी में हैं? ये सवाल उस समय तेज हो गया, जब 7 अगस्त को सऊदी अरब के मक्का में सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच एक अहम त्रिपक्षीय रक्षा समझौता हुआ। जिसे ‘मक्का रक्षा समझौता’ कहा गया। समझौते के बाद वैश्विक मीडिया और रक्षा विशेषज्ञों के बीच इसे ‘इस्लामिक NATO’ नाम दिया जाने लगा। लेकिन NATO क्या है,  इस नए रक्षा समझौते की असली ताकत कितनी है और यह किन देशों के लिए काम करेगा? आइए, आसान भाषा में समझते हैं।

क्या है NATO?

NATO यानी उत्तर अटलांटिक संधि संगठन एक अंतर-सरकारी सैन्य गठबंधन है। इसका मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों की सामूहिक सुरक्षा सुनिश्चित करना है। NATO के सिद्धांत के अनुसार, किसी बाहरी देश द्वारा एक सदस्य देश पर हमला किए जाने की स्थिति में इसे पूरे गठबंधन पर हमला माना जा सकता है और सदस्य देश सामूहिक रूप से उसकी रक्षा के लिए कदम उठा सकते हैं।

NATO की स्थापना 4 अप्रैल 1949 को हुई थी और इसे वाशिंगटन संधि के नाम से भी जाना जाता है। इसका मुख्यालय बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स में है। शुरुआत में NATO में 12 संस्थापक देश शामिल थे, जबकि अब इसके 32 सदस्य देश हैं। स्वीडन 2024 में NATO का सबसे नया सदस्य बना। इसके सदस्यों में अमेरिका और कनाडा के साथ यूरोप के कई देश शामिल हैं।

क्या है ‘इस्लामिक NATO’?

सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हुए रक्षा समझौते के तहत तीनों देशों ने सैन्य अभ्यास, सुरक्षा सहयोग और रक्षा मामलों में समन्वय बढ़ाने पर सहमति जताई है। इसके तहत रियाद में एक सचिवालय स्थापित करने की योजना है। पाकिस्तान को शुरुआती तीन वर्षों के लिए इसका नेतृत्व सौंपे जाने की बात कही गई है।

समझौते की सबसे अहम बात यह है कि तीनों देशों में से किसी एक पर सैन्य हमला होने की स्थिति में उसे तीनों के खिलाफ हमला माना जाएगा। यही वजह है कि इसकी तुलना NATO के आर्टिकल 5 में मौजूद सामूहिक रक्षा के सिद्धांत से की जा रही है। हालांकि, इसे सीधे NATO का विकल्प मानना अभी जल्दबाजी होगी।

यूक्रेन की NATO में एंट्री की चाहत

यूक्रेन आधिकारिक तौर पर NATO में शामिल होना चाहता है और उसने इसे अपने संविधान में एक रणनीतिक राष्ट्रीय लक्ष्य के रूप में भी शामिल किया है। यूक्रेन का मानना है कि NATO की सदस्यता से उसकी सुरक्षा मजबूत होगी और रूस के खिलाफ एक प्रभावी सैन्य रोक तैयार होगी।

वहीं, रूस यूक्रेन के NATO की ओर बढ़ते कदम को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानता है। हालांकि, मौजूदा युद्ध और राजनीतिक परिस्थितियों के चलते यूक्रेन की NATO सदस्यता फिलहाल जटिल बनी हुई है।

साथ ही बांग्लादेश के ‘मक्का डिफेंस पैक्ट’ में शामिल होने की संभावित दिलचस्पी ने भारत की चिंताएं बढ़ा दी हैं। ढाका को औपचारिक निमंत्रण मिलने पर वह राष्ट्रीय और आर्थिक हितों को देखते हुए फैसला लिया जा सकता है।

पाकिस्तान और तुर्किए के साथ संभावित रक्षा सहयोग से भारत की पूर्वी सीमा और क्षेत्रीय रणनीतिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं।

क्यों बनाया गया है ‘इस्लामिक NATO’?

इस रक्षा सहयोग के पीछे कई रणनीतिक कारण माने जा रहे हैं। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, इजरायल-हमास संघर्ष और क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों ने मुस्लिम देशों के बीच सामूहिक सुरक्षा की जरूरत को बढ़ाया है। वहीं, अमेरिका पर सुरक्षा के लिए निर्भरता को लेकर भी कुछ खाड़ी देशों में सवाल उठे हैं।

तीनों देशों की अपनी-अपनी रणनीतिक ताकत है। सऊदी अरब के पास मजबूत आर्थिक क्षमता और क्षेत्रीय प्रभाव है। तुर्की आधुनिक सैन्य तकनीक, ड्रोन और NATO के लंबे सैन्य अनुभव के लिए जाना जाता है। वहीं पाकिस्तान के पास बड़ी सैन्य क्षमता, युद्ध का अनुभव और परमाणु हथियार हैं। ऐसे में इन तीनों की ताकत का मेल इस रक्षा सहयोग को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है।

हालांकि ‘इस्लामिक NATO’ नाम ने इस समझौते को वैश्विक स्तर पर काफी चर्चा दिलाई है, लेकिन इसे अभी NATO के समान शक्तिशाली सैन्य गठबंधन कहना जल्दबाजी होगी। इसकी वास्तविक ताकत इस बात पर निर्भर करेगी कि तीनों देश कितने गहरे सैन्य सहयोग के लिए तैयार होते हैं और भविष्य में इसमें कितने अन्य देश शामिल होते हैं। फिलहाल यह समझौता वेस्ट एशिया की बदलती जियोपॉलिटिक्स में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक कदम जरूर माना जा रहा है।

news desk

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