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महाराष्ट्र में फिर ‘ऑपरेशन लोटस’ की आहट, फडणवीस से नाराज शिंदे ने की अमित शाह से मुलाकात

महाराष्ट्र की सत्तारूढ़ महायुति सरकार (बीजेपी + शिंदे गुट + अजित पवार गुट) में एक बार फिर हलचल बढ़ गई है. स्थानीय निकाय चुनावों से ठीक पहले गठबंधन के भीतर का तनाव खुलकर सामने आने लगा है. शिवसेना (शिंदे गुट) का आरोप है कि बीजेपी उनके स्थानीय नेताओं को अपने पाले में खींच रही है—यानी फिर से ‘ऑपरेशन लोटस’ की आहट!

इसी माहौल में 19 नवंबर को उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने दिल्ली जाकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से करीब 50 मिनट मुलाकात की. ऊपर-ऊपर मीटिंग ‘शिष्टाचार’ बताई गई, लेकिन अंदरखाने चर्चा कुछ और थी.

कहां से शुरू हुआ झगड़ा?

मामला ठाणे और कल्याण-डोंबिवली का है—ये इलाका शिंदे का राजनीतिक गढ़ माना जाता है. बीजेपी ने हाल ही में यहां शिवसेना (शिंदे गुट) के कई स्थानीय नेता और पूर्व पार्षदों को पार्टी में शामिल कर लिया. इससे शिवसेना के अंदर नाराज़गी फूट पड़ी.

18 नवंबर को तो हालत ये हो गया कि शिवसेना (शिंदे गुट) के लगभग सभी मंत्री राज्य मंत्रिमंडल की बैठक का बहिष्कार कर गए. सिर्फ एकनाथ शिंदे ही बैठक में गए. मंत्रियों का कहना था कि वे बीजेपी की “खरीद-फरोख्त राजनीति” का विरोध कर रहे हैं.

बाद में जब शिवसेना मंत्रियों ने फडणवीस से बात की तो उन्होंने उल्टा याद दिला दिया कि पहले उल्हासनगर में शिवसेना ने ही बीजेपी के स्थानीय नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल किया था. काफी चर्चा के बाद दोनों पक्षों ने तय किया—अब कोई किसी के नेताओं को नहीं तोड़ेगा. यानी नो-पोचिंग समझौता.

शिंदे ने अमित शाह से क्या कहा?

सूत्रों के मुताबिक शिंदे ने शाह के सामने साफ कहा कि विधानसभा चुनाव के बाद महायुति के लिए राज्य में बहुत अच्छा माहौल है, खासकर बीएमसी और अन्य निकाय चुनावों के लिए लेकिन बीजेपी के कुछ नेता अपने फैसलों से गठबंधन को नुकसान पहुंचा रहे हैं.

अगर ऐसे कदम जारी रहे तो विपक्ष इसका फायदा उठाएगा. गठबंधन के नेता एक-दूसरे पर पब्लिक में बयानबाज़ी न करें. मीटिंग में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा भी कुछ देर के लिए आए—ये दिखाता है कि मामला हल्का नहीं है.

मीटिंग के बाद शिंदे ने बयान दिया कि ये तो बस “शिष्टाचार भेंट” थी, वे तो बिहार में नीतीश कुमार के शपथ ग्रहण में जा रहे थे और रास्ते में शाह से मिल लिए. लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति समझने वाले जानते हैं—कुछ तो बात है!

बार-बार क्यों भड़क रहा है झगड़ा?


बीजेपी राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बनी है. अब वो स्थानीय स्तर पर भी अपना नेटवर्क बढ़ाना चाहती है—और इसके लिए शिवसेना के गढ़ों में एंट्री लेना जरूरी है. शिंदे मुख्यमंत्री से उपमुख्यमंत्री बने—पार्टी के अंदर भी कई लोग नाराज़ हैं. उन्हें लग रहा है कि सरकार में बीजेपी हाथ ज्यादा मजबूत कर रही है.


बीएमसी, जिला परिषद, नगर पालिका—सभी जगह सीटों और उम्मीदवारों पर खींचतान चल रही है. हर पार्टी खुद को ज्यादा मजबूत दिखाना चाहती है. उद्धव ठाकरे, कांग्रेस और एनसीपी (शरद पवार) इस मुद्दे को जमकर उछाल रहे हैं. आदित्य ठाकरे से लेकर सुप्रिया सुले तक—सब शिंदे पर तंज कस रहे हैं.

आगे क्या हो सकता है?

ऊपर-ऊपर से तो महायुति के नेता एकता का दावा कर रहे हैं. फडणवीस और शिंदे ने भी कह दिया कि “एक-दूसरे के नेताओं को नहीं तोड़ेंगे.”

लेकिन जमीनी स्तर पर माहौल अभी भी गर्म है. निकाय चुनाव की तैयारी के बीच अगर शाह और नड्डा जैसे केंद्रीय नेता बीच में न पड़े, तो ये खटास चुनावी नतीजों को सीधा प्रभावित कर सकती है.

महायुति सरकार अपनी पहली वर्षगांठ से ठीक पहले सबसे बड़े संकट से जूझती दिख रही है. अब देखने वाली बात ये होगी कि शाह की मध्यस्थता से सब कुछ ठीक होता है या नहीं.

news desk

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