रियाद/वाशिंगटन। यमन के हूती विद्रोही (Houthi Rebels) और सऊदी अरब के बीच बढ़ते तनाव के बीच मध्य पूर्व (Middle East) की राजनीति में एक नया और बड़ा मोड़ आता दिख रहा है। मक्का पर हूती लड़ाकों द्वारा ड्रोन हमले के दावों के बाद यह सवाल तेजी से गहरा गया है कि क्या सऊदी अरब जल्द ही ‘अब्राहम समझौते’ (Abraham Accords) का हिस्सा बनने जा रहा है?
अमेरिका के पीछे हटने और पुराने सहयोगियों के घटते समर्थन के बीच सऊदी अरब ने अपनी सुरक्षा के लिए इतिहास में पहली बार इजराइल से खुफिया मदद (Intelligence Support) मांगी है।
1. मक्का पर हमले की खबर और भावनात्मक माहौल
बुधवार को सऊदी अरब की ओर से दावा किया गया कि मक्का की ओर दागे गए एक हूती ड्रोन को वक्त रहते इंटरसेप्ट कर नष्ट कर दिया गया। हालांकि, हूती विद्रोहियों ने इसे पूरी तरह ‘फेक न्यूज’ करार दिया है। सऊदी ने इस दावे के समर्थन में अब तक कोई ठोस सबूत साझा नहीं किए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मक्का जैसे धार्मिक और संवेदनशील मुद्दे को सामने रखकर सरकार ऐसे कड़े कूटनीतिक फैसलों की जमीन तैयार कर रही है, जिसका जनता विरोध न कर सके।
2. अमेरिका का इनकार और इजराइल से मांगी मदद
हूती संकट से निपटने के लिए सऊदी अरब ने शुरुआत में अमेरिका से मदद मांगी थी, लेकिन वाशिंगटन ने हाथ पीछे खींच लिए। इसके बाद अमेरिका के इशारे पर ही सऊदी ने इजराइल का रुख किया। जानकारों के अनुसार, सऊदी अरब अब यूएई (UAE) के नक्शेकदम पर चल रहा है, जिसने इजराइल से खुफिया और सैन्य सहयोग हासिल करने के बाद अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।
3. पाकिस्तान और मक्का समझौते का बेअसर होना
सऊदी ने सुरक्षा के लिए पाकिस्तान के साथ ‘मक्का समझौता’ किया था और उसे 2 अरब डॉलर की आर्थिक सहायता भी दी थी। इस संधि के तहत हमला होने की स्थिति में पाकिस्तान को सैन्य मदद देनी थी। हालांकि, हूती संकट के समय पाकिस्तान और तुर्की दोनों ने दूरी बना ली। इसके बावजूद सऊदी ने पाकिस्तान के खिलाफ कोई कड़ा कदम नहीं उठाया, जो उसकी बदलती कूटनीतिक प्राथमिकताओं को दर्शाता है।
पैगंबर इब्राहीम (अब्राहम) के नाम पर बने इस समझौते की शुरुआत साल 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता से हुई थी। इसका मुख्य उद्देश्य अरब/मुस्लिम देशों और इजराइल के बीच राजनयिक संबंध बहाल करना, व्यापार बढ़ाना और रक्षा सहयोग को मजबूत करना है। अब तक यूएई, बहरीन, सूडान और मोरक्को इस समझौते में शामिल हो चुके हैं।
सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) देश में 20% तक यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) के लिए अमेरिका के साथ एक असैन्य परमाणु समझौता (Civilian Nuclear Deal) करना चाहते हैं।
हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रुख के अनुसार, जब तक सऊदी अरब औपचारिक रूप से इजराइल को एक देश के रूप में मान्यता देकर ‘अब्राहम अकॉर्ड’ में शामिल नहीं होता, तब तक वाशिंगटन उसे परमाणु कार्यक्रम की अनुमति नहीं देगा।
नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने विश्वकर्मा जयंती के खास अवसर पर देश के संगठित क्षेत्र…
प्रयागराज के हंडिया में सपा नेता और पूर्व ग्राम प्रधान पवन यादव की हत्या के…
खामोश और गहरे समंदर में जब लहरों का शोर ही सब कुछ होता है, तब…
लखनऊ में युवती को कार से टक्कर मारने और चलती कार के बोनट पर उसके…
हर साल की तरह इस साल भी खान परिवार में गणेश चतुर्थी के मौके पर…
नई दिल्ली। एशियन गेम्स 2026 (Asian Games 2026) से ठीक पहले भारतीय क्रिकेट टीम को…