भारतीय नौसेना ने आज इतिहास के पन्नों को एक बार फिर से जीवित कर दिया है। प्राचीन भारतीय समुद्री इंजीनियरिंग का चमत्कार कही जाने वाली नौका (इंडियन नेवल सेलिंग वेसल) INSV ‘कौण्डिन्य’ ने अपनी 18 दिनों की यात्रा पूरी कर ओमान के मस्कट तट पर सफलतापूर्वक कदम रख दिया है। गुजरात के पोरबंदर से शुरू हुआ ये सफर न केवल 2,400 किलोमीटर की दूरी का था, बल्कि ये भारत की हजारों साल पुरानी समुद्री विरासत को फिर से स्थापित करने का एक बड़ा मिशन था।
लहरों पर ‘Men of Steel’ का कब्जा
29 दिसंबर 2025 को पोरबंदर से रवाना हुई ये नौका पूरी तरह से प्रकृति और हवा के रुख पर निर्भर थी। इसमें आधुनिक जहाजों की तरह कोई इंजन नहीं लगा था। कमांडर विकास श्योराण के नेतृत्व में 16 सदस्यीय क्रू ने अरब सागर की उग्र लहरों, बदलती हवाओं और भारी बारिश का सामना करते हुए इस मिशन को अंजाम दिया।

मस्कट के सुल्तान काबूस बंदरगाह (Port Sultan Qaboos) पहुंचने पर भारतीय नौसेना के इस बेजोड़ जहाज को ‘वॉटर सैल्यूट’ देकर सम्मानित किया गया। तट पर पहुंचते ही क्रू ने संदेश भेजा “Land Ahoy! मस्कट दिख गया है! गुड मॉर्निंग इंडिया; गुड मॉर्निंग ओमान!”
न लोहा, न कील… सिर्फ नारियल की डोर
INSV कौण्डिन्य की सबसे बड़ी खासियत इसका निर्माण है। इसे 5वीं शताब्दी की अजंता गुफाओं में मिले चित्रों के आधार पर डिजाइन किया गया है। इसे बनाने में एक भी लोहे की कील का यूज़ नहीं किया गया था, बस लकड़ी के तख्तों को नारियल की रस्सियों से हाथ से सिला गया है।

जोड़ों को सील करने के लिए मछली के तेल, नेचुरल गोंद यानि रेसिन और नारियल के रेशों का इस्तेमाल किया गया।
इसके पालों (Sails) पर ‘गंडभेरुंडा’ और सूर्य के चित्र बने हैं, जबकि इसके आगे के हिस्से पर ‘सिंह व्याली’ की नक्काशी की गई है।
संजीव सान्याल: हर दिन का आंखों देखा हाल
प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल भी इस क्रू का हिस्सा थे। उन्होंने इस यात्रा को “लकड़ी के जहाज पर फौलादी इंसान” (Ship of wood with men of steel) करार दिया। सान्याल ने सोशल मीडिया के जरिए दुनिया को बताया कि कैसे वे रात में चांद की रोशनी में डेक पर सोते थे और आधुनिक जीपीएस के बिना केवल नक्षत्रों और हवा के ज्ञान से रास्ता तय करते थे।

विशेषज्ञों के अनुसार, ये यात्रा ‘प्रोजेक्ट मौसम’ के तहत भारत के सांस्कृतिक प्रभुत्व को दर्शाती है। ये उन प्राचीन व्यापारिक मार्गों की याद दिलाती है जिनसे भारतीय व्यापारी मसाले और सिल्क लेकर ओमान और अफ्रीका तक जाते थे। प्रधानमंत्री ने भी इस सफलता पर क्रू को बधाई देते हुए इसे भारत की समुद्री शक्ति का गौरव बताया है।