नई दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में 21 दिसंबर को आयोजित एक सार्वजनिक बहस ने देशभर में बौद्धिक और सामाजिक हलचल पैदा कर दी। मशहूर गीतकार और घोषित नास्तिक जावेद अख्तर तथा इस्लामिक स्कॉलर मुफ्ती शमाइल नदवी के बीच ‘ईश्वर के अस्तित्व’ पर हुई यह चर्चा करीब दो घंटे चली। इंडिया टुडे हिंदी और द लल्लनटॉप के संपादक सौरभ द्विवेदी ने इसे मॉडरेट किया। अकादमिक डायलॉग फोरम और वहयैन फाउंडेशन द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम को टीवी डिबेट की आक्रामक शैली से अलग रखा गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में दर्शक मौजूद रहे, जबकि यूट्यूब लाइव स्ट्रीम को छह घंटे में ही 15 लाख से अधिक व्यूज मिल गए।
यह बहस उस विवाद के बाद सामने आई जब पश्चिम बंगाल उर्दू अकादमी ने जावेद अख्तर से जुड़ा एक साहित्यिक कार्यक्रम विरोध के चलते रद्द कर दिया था। इसके बाद मुफ्ती नदवी की सोशल मीडिया चुनौती ने इस संवाद का रास्ता खोला। शुरुआत में ही सौरभ द्विवेदी ने साफ किया कि न तो नारेबाजी होगी और न ही किसी धर्म का प्रचार या विरोध।
आस्था बनाम तर्क: दार्शनिक टकराव
मुफ्ती शमाइल नदवी ने दर्शनशास्त्र के ‘कंटिजेंसी आर्ग्युमेंट’ के जरिए ईश्वर के अस्तित्व का पक्ष रखा। उनका तर्क था कि ब्रह्मांड स्वयं पर निर्भर नहीं हो सकता, इसलिए इसके पीछे एक शाश्वत और स्वतंत्र ‘आवश्यक अस्तित्व’ का होना तर्कसंगत है। उन्होंने कहा कि विज्ञान “कैसे” का जवाब देता है, जबकि धर्म “क्यों” का।
जावेद अख्तर ने धार्मिक विश्वासों की स्थिरता पर सवाल उठाए। उन्होंने ऐतिहासिक उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे-जैसे ज्ञान बढ़ता है, आस्थाएं बदलती हैं। उनके अनुसार विश्वास तर्क और प्रमाण पर आधारित होता है, जबकि आस्था बिना सबूत स्वीकार करने की मांग करती है।
नैतिकता, पीड़ा और सोशल मीडिया प्रतिक्रिया
न्याय और नैतिकता पर बहस तब तेज हुई जब अख्तर ने युद्ध, भूख और गाजा में मरते बच्चों का जिक्र किया। नदवी ने जवाब दिया कि बुराई मानव स्वतंत्र इच्छा का परिणाम है, न कि ईश्वर की विफलता।
बहस के बाद यह सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। कुछ यूजर्स ने नदवी के तर्कों की सराहना की, तो कुछ ने अख्तर की नैतिक दलीलों को मजबूत बताया। विशेषज्ञों के अनुसार, यह बहस ध्रुवीकरण के दौर में स्वस्थ असहमति और खुली अभिव्यक्ति का अहम उदाहरण बनकर उभरी है।