जमात-ए-इस्लामी की नई रणनीति
ढाका: बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव से ठीक पहले कट्टरपंथी इस्लामी पार्टी जमात-ए-इस्लामी ने अपना चुनावी घोषणापत्र जारी कर दिया है, और इस बार पार्टी का रुख पहले की तुलना में काफी नरम दिखाई दे रहा है। 41 बिंदुओं वाले इस घोषणापत्र में महिलाओं, युवाओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों—खासकर हिंदू मतदाताओं—को ध्यान में रखते हुए कई वादे किए गए हैं। सबसे बड़ा बदलाव विदेश नीति में दिख रहा है, जहां पार्टी ने भारत समेत पड़ोसी देशों के साथ “शांतिपूर्ण, मित्रवत और सहयोगात्मक संबंध” बनाने की बात कही है। विशेषज्ञ इसे पार्टी की चुनावी रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं, क्योंकि हाल के महीनों में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हमलों की घटनाओं के बाद भारत-बांग्लादेश संबंधों में तनाव बढ़ा है।
पड़ोसी देशों के साथ संबंध सुधारने की कोशिश
घोषणापत्र में साफ कहा गया है कि भारत, भूटान, नेपाल, म्यांमार, श्रीलंका, मालदीव और थाईलैंड जैसे पड़ोसी देशों के साथ पारस्परिक सम्मान और समानता के आधार पर संबंध मजबूत किए जाएंगे। यह बयान इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि अतीत में पार्टी का रुख अक्सर भारत विरोधी माना जाता रहा है। भारत के विदेश मंत्रालय ने भी स्पष्ट कर दिया है कि उसका आकलन चुनावी वादों से नहीं बल्कि भविष्य की वास्तविक कार्रवाइयों से तय होगा।
अल्पसंख्यकों और महिलाओं को लेकर नए वादे
हिंदू मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए पार्टी ने “समावेशी राज्य” का वादा किया है और कहा है कि सत्ता में आने पर कैबिनेट में धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व दिया जाएगा। खास बात यह है कि पहली बार जमात ने चुनाव में एक हिंदू उम्मीदवार—खुलना से कृष्णा नंदी—को मैदान में उतारा है। हालांकि अभी तक पार्टी ने कोई महिला उम्मीदवार घोषित नहीं किया है, लेकिन घोषणापत्र में कैबिनेट में महिलाओं की महत्वपूर्ण भागीदारी का वादा किया गया है।
जमात-ए-इस्लामी 11-पार्टी गठबंधन के साथ चुनाव मैदान में है और सर्वेक्षणों में उसे 30-34 प्रतिशत तक समर्थन मिलता दिख रहा है। इस चुनाव में अवामी लीग की अनुपस्थिति के कारण मुकाबला मुख्य रूप से बीएनपी और जमात के बीच माना जा रहा है। लगभग 8 प्रतिशत अल्पसंख्यक हिंदू मतदाता कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं, इसलिए सभी पार्टियां उन्हें साधने की कोशिश कर रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जमात का यह नरम रुख चुनावी रणनीति हो सकता है, जबकि उसकी मूल विचारधारा अब भी इस्लामी शासन पर आधारित मानी जाती है। चुनाव परिणाम 12 फरवरी को आएंगे, जो बांग्लादेश की राजनीति की दिशा तय करने में अहम साबित हो सकते हैं।
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