30 की उम्र को आमतौर पर मानसिक क्षमता का सबसे मजबूत दौर माना जाता है। लेकिन आज कई युवा महसूस कर रहे हैं कि उनकी याददाश्त पहले जैसी तेज नहीं रही। मीटिंग में ध्यान भटक जाता है, काम करते समय फोकस टूट जाता है और कभी-कभी साधारण शब्द भी याद नहीं आते। यह स्थिति घबराने वाली जरूर लगती है, लेकिन हर बार यह याददाश्त खोने का संकेत नहीं होती। अक्सर इसके पीछे “ब्रेन फॉग” नाम की स्थिति होती है।
ब्रेन फॉग कोई बीमारी नहीं, बल्कि लक्षणों का एक समूह है। इसमें मानसिक थकान, उलझन, ध्यान की कमी, छोटी-छोटी बातें भूल जाना और एक साथ कई काम करने में दिक्कत शामिल है। कई लोग इसे ऐसे अनुभव करते हैं जैसे उनका दिमाग पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहा हो।
विशेषज्ञों के अनुसार युवाओं में ब्रेन फॉग का मुख्य कारण डिमेंशिया नहीं, बल्कि आधुनिक जीवनशैली है। लगातार तनाव, काम का दबाव, आर्थिक जिम्मेदारियां, परिवार और सोशल स्टेटस बनाए रखने की चिंता मानसिक थकान को बढ़ा देती है। इसके अलावा लंबे समय तक स्क्रीन के सामने बैठना भी दिमाग को ओवरलोड कर सकता है।
नींद की कमी एक बड़ा कारण है। जब हम सोते हैं, तब दिमाग खुद को रिपेयर करता है और दिनभर की जानकारी को व्यवस्थित करता है। यदि नींद पूरी नहीं होती, तो अगले दिन सुस्ती और फोकस की कमी महसूस होती है। देर रात तक मोबाइल या लैपटॉप का उपयोग शरीर को भी प्रभावित करता है।

तनाव के दौरान शरीर में कोर्टिसोल हार्मोन बढ़ जाता है, जिससे दिमाग “सर्वाइवल मोड” में चला जाता है। इस अवस्था में ध्यान और याददाश्त दोनों कमजोर पड़ सकते हैं। पोषण की कमी भी असर डालती है। विटामिन बी12, विटामिन डी3 और आयरन की कमी से ऊर्जा स्तर गिर सकता है और मानसिक स्पष्टता कम हो सकती है। अगर थकान, बाल झड़ना या त्वचा का पीला पड़ना जैसे लक्षण दिखें, तो जांच कराना जरूरी है।
अच्छी बात यह है कि ज्यादातर मामलों में लाइफस्टाइल में सुधार से ब्रेन फॉग कम किया जा सकता है। रोज कम से कम 30 मिनट व्यायाम करें, पर्याप्त पानी पिएं, नियमित समय पर सोएं और सोने से पहले स्क्रीन से दूरी बनाएं। मेडिटेशन, योग और ब्रीदिंग एक्सरसाइज भी मददगार हैं।
हालांकि, अगर भूलने की समस्या लगातार बढ़ रही हो या इसके साथ तेज सिरदर्द, बोलने में दिक्कत या अचानक भ्रम जैसे लक्षण हों, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। समय पर ध्यान देना ही दिमाग को स्वस्थ रखने की कुंजी है।