मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच कूटनीति अब खुली बातचीत से ज्यादा “बैकचैनल” पर टिकी नजर आ रही है। अब्बास अराघची के हालिया बयान ने साफ कर दिया है कि तेहरान और वॉशिंगटन के बीच संपर्क पूरी तरह टूटा नहीं है, लेकिन इसे औपचारिक बातचीत का नाम देना जल्दबाजी होगी।
अराघची ने संकेत दिया कि अमेरिका की ओर से लगातार संदेश मिल रहे हैं, जिनमें स्टीव विटकॉफ की भूमिका भी सामने आई है। हालांकि, ईरान इस संवाद को “नेगोशिएशन” मानने से बच रहा है। यह रुख बताता है कि दोनों देश फिलहाल अपने-अपने रणनीतिक हितों को सुरक्षित रखते हुए सीमित संपर्क बनाए रखना चाहते हैं।
ईरान का जोर इस बात पर है कि वह किसी अस्थायी युद्धविराम के बजाय स्थायी समाधान चाहता है। तेहरान की प्राथमिकता साफ है—क्षेत्र में स्थिरता तभी संभव है जब उसकी सुरक्षा को लेकर ठोस और भरोसेमंद गारंटी मिले। यही वजह है कि वह जल्दबाजी में किसी प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया देने से बच रहा है।
दूसरी तरफ, मसूद पेजेश्कियान ने भी यह संकेत दिया है कि ईरान लंबे संघर्ष के पक्ष में नहीं है। उन्होंने साफ कहा कि युद्ध खत्म हो सकता है, लेकिन इसके लिए ईरान के हितों और सुरक्षा से समझौता नहीं किया जाएगा। यह बयान बताता है कि तेहरान सैन्य दबाव के बीच भी कूटनीतिक विकल्प खुला रखना चाहता है।
उधर, डोनाल्ड ट्रंप का दावा है कि यह टकराव जल्द खत्म हो सकता है और अमेरिका अपने मकसद के करीब पहुंच चुका है। ट्रंप का यह बयान अमेरिका के आत्मविश्वास को दिखाता है, लेकिन जमीनी हालात अब भी अनिश्चित बने हुए हैं।
पूरे घटनाक्रम से यह साफ है कि भले ही सार्वजनिक मंचों पर कड़े बयान दिए जा रहे हों, लेकिन पर्दे के पीछे बातचीत के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। “मैसेज डिप्लोमेसी” के जरिए दोनों पक्ष टकराव को नियंत्रित रखने और अपने-अपने फायदे सुरक्षित करने की कोशिश में हैं।
यानी जंग सिर्फ मैदान में नहीं, बल्कि कूटनीतिक गलियारों में भी पूरी तीव्रता से लड़ी जा रही है।
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